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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Saturday, November 3, 2007

अपने-पराये !

जो अपने न थे, उन्हे अपना बनाने की कोशिश में,
अपनों से दूर हो गये हम ।
इस भीड़ भरी दुनिया में, अकेले रहने को,
मज़बूर हो गये हम ।

कहीं तो किसी बात का किसी को एहसास होता,
जिसका कोई नहीं, कोई तो उसके पास होता,
हर तरफ मची धोखों की धूम में,
किसी पर तो हमें विश्वास होता,
यूं ही चलते-चलते म्रगत्रष्णा में,
खो गये हम ।

बनाते रहे तमाशा अपनी वफाई का,
बाजार पर गर्म है अब बेवफाई का,
बस काम से ही मतलब सबको ज़माने में,
डर नहीं किसी को तेरी खुदाई का,
अब तो अपनों की दुनिया में ही,
बेगाने हो गये हम ।

7 Comments:

Blogger sunita (shanoo) said...

सबसे पहले आपको बधाई आपका चिट्ठा भी मैने मेरे चिट्ठे के साथ राजस्थान पत्रिका में देखा था...

November 3, 2007 at 5:53 PM  
Blogger sunita (shanoo) said...

बहुत सुन्दर रचना है डॉक्टर साहब...

November 3, 2007 at 5:54 PM  
Blogger बाल किशन said...

वाह बहुत खूब.
बनाते रहे तमाशा अपनी वफाई का,
बाजार पर गर्म है अब बेवफाई का,
बस काम से ही मतलब सबको ज़माने में,
डर नहीं किसी को तेरी खुदाई का,
अब तो अपनों की दुनिया में ही,
बेगाने हो गये हम ।
डा0 साहब आप बहुत अच्छी गजले लिखतें है किताब अगर छपवाई हो तो बताएं.और अगर भेज सके तो और अच्छा होगा.

November 3, 2007 at 5:57 PM  
Blogger बाल किशन said...

वाह बहुत खूब.
बनाते रहे तमाशा अपनी वफाई का,
बाजार पर गर्म है अब बेवफाई का,
बस काम से ही मतलब सबको ज़माने में,
डर नहीं किसी को तेरी खुदाई का,
अब तो अपनों की दुनिया में ही,
बेगाने हो गये हम ।
डा0 साहब आप बहुत अच्छी गजले लिखतें है किताब अगर छपवाई हो तो बताएं.और अगर भेज सके तो और अच्छा होगा.

November 3, 2007 at 5:58 PM  
Blogger काकेश said...

सुन्दर अहसास. आनंदम

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November 3, 2007 at 6:08 PM  
Blogger mahashakti said...

बहुत ही सुन्‍दर पक्तिंयाँ, आपकी पूरी कविता जानदार है किन्‍तु अन्तिम विशेष अच्‍छी लगी।

November 4, 2007 at 9:28 AM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

प्रोत्साहन के लिये सभी को दिल से धन्यवाद । आप सभी को मेरे दिल से निकली पक्तियाँ पसंद आई उसके लिये मन विशेष आनदित हुआ ।

November 4, 2007 at 9:48 AM  

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