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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Monday, June 22, 2009

" कोई आइल नहीं हैं हम !"

तेरी तरह संगदिल नहीं हैं हम,
चाहने वालों के कातिल नहीं हैं हम ।

सूरते-हाल पर कभी तो गौर करो,
इतने भी नाकाबिल नहीं हैं हम ।

दिल में कुछ औ’ चेहरे पर कुछ और रहे,
तुम जैसे तो आकिल(*) नहीं हैं हम ।

यूं शक से हरदम न देखा करो,
तुम्हारे लिये हलाहल(&) नहीं हैं हम ।

यूं न आँखें दिखा हाले-इजहार से,
एक इंसा हैं, कोई आइल(#) नहीं हैं हम ।

(*) बुद्धिमान (&) विष (#) सन्यासी

Wednesday, June 17, 2009

"ग़मों संग सुहागरात हुई!"

रात सितारों से ही बात हुई,
सारी रात यूँ ही खाक हुई ।

उनकी सूरत पर भरोसा कर बैठे,
अनजाने ही जिंदगी चाक हुई ।

दामन जलने से बचा न सके हम,
ठंडी राख भी अब आग हुई ।

दुनिया की ठोकरें लगती ही रहीं,
मेरी कामयाबी आप से आप हुई ।

उनकी बेवफाई का ये आलम रहा,
गमों संग अपनी सुहागरात हुई ।

Thursday, June 11, 2009

"कभी तो याद कर लिया करो !"

खवाबों में ही बात कर लिया करो,
कभी तो याद कर लिया करो !

पत्थर के बुत नहीं हैं तुम्हारी तरह,
चाहो तो घात कर लिया करो !

दिल में वीराने ही वीराने बसे हैं,
दो पल तो आबाद कर लिया करो !

दुनिया में हैरानियाँ कुछ कम नहीं,
किसी बहाने दिल शाद कर लिया करो !

हम तो हार कर चुप बैठ गये,
तुम ही कभी इज्तिहाद* कर लिया करो !

*कोशिश

Monday, June 1, 2009

"दर्द का सिलसिला"

दर्द का सिलसिला है चल पड़ा
कौन जाने अब मिले कहाँ दवा

जान जिस को गिरवी हमने दे दी थी
बीच चौराहे पे सौदा कर गया

वो जुबाँ से कुछ कभी कहते नहीं
सोचते हैं हमको सब कुछ है पता

शौक से तू चुभा नश्तर मेरे
जख्म भी नासूर अब तो बन चुका

दरमियाँ बातों के सब कुछ कह दिया
पूछते हो फिर तुम्हारी क्या खता

Friday, May 29, 2009

"कोमल सी हो !"

कोमल सी हो तुम मधुप्रिये
मेरा पथ काँटों से भरा
साथ मेरा दोगी तुम कैसे
कभी है नभ से मिली धरा

पग-पग चलना हुआ है दूभर
व्यथित रहे बोझिल मन दिन भर
तपती धूप, है जलते पाँव
नहीं पता कहाँ मिलेगा ठाँव
यूँ तो तुम लगती हो मुझको
जीवन में शीतलमयी सुरा
पर सोचो तुम आज तलक
कभी है नभ से मिली धरा

दूर क्षितिज तक नजर दौडाएँ
स्वप्न इंद्रधनुषी नजर में आएँ
पर उनको क्या पकड़ सकें हम
व्यर्थ वो हमको हैं तड़पाएँ
मैं हूं सपना, तुम एक हकीकत
साथ है अपना जरा-जरा
आज तलक दुनिया में बोलो
कभी है नभ से मिली धरा





"तुम आये, दीप जले !"

तुम आये, दीप जले
वन-उपवन फूल खिले

नीरव मन, जड़ चेतन
नहीं बीते कोई क्षण
आहट तेरी सुन
ह्रदय के तार हिले
तुम आये, दीप जले

विहग हुए अनमन
करें न कोई स्वन
सुन तेरी पायल की धुन
सुरीली गुंजन निकले
तुम आये, दीप जले

चक्षु रहें थे बंद मेरे
निरंतर लें स्वप्न तेरे
ख्यालों-ख्यालों में ही
नयनों के तीर चले
तुम आये, दीप जले

क्रूर दिवाकर देह जलाये,
मनोवेग हैं मन बहकाये,
रुत कोई नहीं मन भाये,
तुम आओ, मौसम बदले
तुम आये, दीप जले


Wednesday, May 20, 2009

"कौन सुने"

कौन सुने ह्रदय की बात !
सूना दिन, है काली रात !!

क्षोम भरी पाती लिखता हूँ,
बार-बार फिर खुद पढ़ता हूँ,
यूँ ही हो जाती प्रभात !

अधरों पर मुस्कान नहीं है,
अँखियों में उल्लास नहीं है,
कैसी तुमने दी सौगात !

घन-घन-घन घनघोर घटा है,
पर मेरा मन सबसे कटा है,
बेकाबू हो गये हालात !

नभ के तारे बने सखा हैं,
उन्हें ही मेरा हाल दिखा है,
बाकी सबने की है घात !

Monday, April 13, 2009

गज़ल !

रोयाँ-रोयाँ रोया था तेरी खातिर,
चैन दिल ने खोया था तेरी खातिर ।

बात तारों से कर के गुजारूँ मैं रात,
मैं न कब से सोया था तेरी खातिर ।

फकत काँटे ही मुझको थमाये थे क्यों,
फूल मैंने बोया था तेरी खातिर ।

तुम तो गैरों को करते रहे थे हवा,
होश मैंने खोया था तेरी खातिर ।

कोई सुनता नहीं क्यों मेरी दास्ताँ,
ये जहाँ भी गोया था तेरी खातिर ।

Thursday, March 26, 2009

"यूँ ही सही"

तुम्हारी खुशी मेरे आँसुओं में है, तो यूँ ही सही,
रिश्ता ग़र इन्ही बातों से है, तो यूँ ही सही !

दिल की बात ज़ुबाँ पर आना जरूरी तो नहीं,
वो कहने पर भी न समझें, तो यूँ ही सही !

हमने तो उनकी खातिर घर भी फूँक दिया,
वो फिर भी न आग बुझाएँ, तो यूँ ही सही !

ज़ख्म अपने तो वैसे भी बहुत दर्दीले थे,
वो फिर भी नमक लगाएँ, तो यूँ ही सही !

हम तो उन्हे फूल ही पेश करते रहे सदा,
उन्हे हमें काँटे ही देने हैं, तो यूँ ही सही !

Tuesday, March 24, 2009

तेरे अधर !

अधरों पर
तुम्हारे प्यार के कुहासे छाए हैं
कोई मुस्कराए तो कैसे ?

जीवन का हर क्षण
तुम्हारा नाम गुनगुनाए है
कोई मर जाए तो कैसे ?

कलियों औ' भौरों की
गुपचुप से मन शर्माए है
कोई कुछ बतलाए तो कैसे ?

उनके कदमों की आहट पर
हमने कान लगाए हैं
कोई छिप जाए तो कैसे ?

रीता मन
हरदम उन्हे अपने पास बुलाए है
कोई गीत गाए तो कैसे ?


[ये रचना दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Thursday, March 19, 2009

क्यों काँटे है चुभाता !

मेरा प्यार ग़र तुझपे कोई असर दिखाता,
कभी तो तेरी आँख को नम कर जाता !

दम भर के दोस्ती का, दुश्मनी निभाते रहे,
दोस्त तो दुश्मनी में भी दोस्ती है निभाता !

सुबह की रौशनी हमें कभी न मिली, न सही,
शाम को तो मज़ार पर कोई दीया जलाता !

जीवन के रेगिस्तान में, आँख में कण पड़ेंगे ही,
कोई तो होता जो मेरी आँख सहला जाता !

बाद मरने के ग़र मैय्यत पर फूल चढ़ाने हैं,
तो फिर जीते जी क्यों काँटे है चुभाता !

Tuesday, March 17, 2009

"ज़रा देखो तो"

खिड़की की ओट से,
परदे के छोर को,
धीमे से सरका कर,
जरा देखो तो,
पिया खड़े हैं !

मन में प्यास जगाये,
इक आस लगाये,
तेरे दीदार को,
जरा देखो तो,
पिया खड़े हैं !

चाँदनी धूप सी चुभे है,
फूल नश्तर बने हैं,
सह सारे जुल्म,
जरा देखो तो,
पिया खड़े हैं !

मान रूप का करो,
जहाँ चाहे छुपो,
झाँक दिल में मगर,
जरा देखो तो,
पिया खड़े हैं !
[ये रचना दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Friday, March 13, 2009

ख्वाब तुम्हारे!

मन बंजारा,
सब कुछ हारा,
सेंध लगाई जब से तुमने,
प्रीत भरी इन नजरों से !

छैलछबीला,
था रंगीला,
सब रंग खोये मैंने अपने,
चढ़ी हो जब से नजरों में !

धूप कँटीली,
हुई नशीली,
इंतजार के फूल बिछाए,
जब राह में तेरी नजरों ने !

रात थी सोई,
सपनों में खोई,
देख सुनहरे ख्वाब तुम्हारे,
जाग उठी इन नजरों में !

सुबह सवेरे,
पंछी चितेरे,
चहक उठे मेरे अँगना में आ कर,
हो के पुलक तेरी नजरों से !

[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Thursday, March 12, 2009

तेरे आँगन में ही बरसें !

दो सलोने नयन तेरे मस्त कज़रारे,
बन गये मेरी अँधेरी रात के तारे !

रेशमी गेसु जो झूमें, साथ झूमें घन,
तेरे आँगन में ही बरसें, छोड़ घर सारे !

शाम भी तेरी हया सी लाल है कब से,
आ रही है रात कहती चाँद निकला रे !

बयार ने पलटा जो घूँघट, गाल छूने को,
यूँ लगा, चहुँ ओर तेरा नूर बरसा रे !

हौले से छम-छम बजे जब तेरी पायलिया,
छेड़े वो संगीत, जो हर दिल में बसता रे !

Wednesday, March 11, 2009

उनके लिये तो वो होली का गुलाल है !

शाम-ओ-सहर शाह-ए-मग्रिब* शाहिद-ए-हाल& है,
इक तू ही मेरे हाल से बेख्याल है !

बेगोरोकफन% हुआ हूँ तेरे इश्क में ऐ रकीब,
तेरा ग़म ही मेरा कफन-ए-दुशाल है !

सहन होता नहीं शोर दिल का अब तो यारब,
इसको तेरे लिये धड़कने का मलाल है!

हालत-ए-इन्तजार की खबर क्यों होगी उन्हे,
उन्हे तो मुड़ के देखना भी मुहाल है !

खूँ के कतरे अश्क बनके बहते ही रहे,
उनके लिये पर वो होली का गुलाल है !


*चाँद &गवाह %जिसे कफन न मिला हो

Friday, March 6, 2009

"तेरी स्मृतियों का लोक मिला !"

ये कैसे स्वप्न दिये मुझको,
तेरी स्मृतियों का लोक मिला !

धुँध से फैले हैं गीत मधुर,
सूने उर के इस प्राँगण में,
चपला-चँचल से मीत मेरे,
अठखेली करे मन-आँगन में,
खुशियाँ पाने के लालच में,
तुझको खोने का शोक मिला !

शोभित होते हैं तारों से,
सीपी-मुख जड़े धवल मोती,
चँदा है चुराता तेरी छवि,
तू अल्हड़ सी जब है सोती,
बिन बाती दीया जलता है,
ऐसा तेरा आलोक मिला !

Thursday, March 5, 2009

"बिंदिया माथे की मुझे बना लो न !"

करवटें ले रहा ये मौसम है,
तुम भी पलकों को कुछ उठा लो न !

कैद मैं क्यों रहे जवानी अब ?
खुद को कलियों सा तुम खिला लो न !

रात की बेबसी पे रहम करो,
गेसु मुख से जरा हटा लो न !

बहुत खलती है सूनी पेशानी,
बिंदिया माथे की मुझे बना लो न !

निगाहें बेशुमार तकती हैं,
पहरे पर मुझको तुम बिठा लो न
!

[ये रचना दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Wednesday, March 4, 2009

भीनी-भीनी धूप !

लज़ीले चेहरे को यूँ छुपाया काली ज़ुल्फों ने,
सुबह की लालिमा को जैसे ढाँपे कोहरा ठंड में !

सिमटती जा रही हो शर्म से खुद ही में तुम ऐसे,
कली जैसे खिले आधी बला के सर्द मौसम में !

पता है, क्यों गुलाबी होंठ कुम्हलाए पड़े हैं यूँ,
है चूमा बार-बार इनको, हवा मस्ताई जालिम ने !

सूनापन ये आँखों का तुम्हारी खा रहा चुगली,
चुरा के ले गया है मन को कोई प्यारे आलम में !

उठा के भारी पलकों को, झटक के काली ज़ुल्फों को,
खिलाओ भीनी-भीनी धूप मेरे मन के आँगन में !


[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Tuesday, March 3, 2009

"………शरमाया करती हो!"

झुके नयनों के कोरों से तुम झाँका करती हो,
मैं जानता हूँ तुम मुझसे शर्माया करती हो !

मैं पास आऊँ, फेरती हो मुँह क्यों तुम अपना,
ग़र बाद मेरे सखियों से ढुँढवाया करती हो !

चुप रह जाती हो, बोलना मैं चाहूँ जब तुमसे,
पर तन्हाई में गीत मेरे गाया करती हो !

रखना न था ग़र वास्ता मुझसे कोई तुमने,
तो चुपके-चुपके सपनों में क्यों आया करती हो?

जब चाहती हो प्रियतम को अपने मन ही मन में,
क्यों बेवजह ही मुझको तुम तड़पाया करती हो !

[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Monday, March 2, 2009

ज़हर दिया क्यों नज़राना था !

बस तुमको आजमाना था,
एक और धोखा खाना था !

मँझधार में हम अकेले थे,
साहिल पे सारा जमाना था !

बेरहमी से कुचल गये दिल वो,
दिल फिर भी उनका दीवाना था !

आँख कब से लगाये बैठे थे वो,
मेरे घर पर उनका निशाना था !

जान वैसे भी अपनी हाजिर थी,
ज़हर दिया क्यों नज़राना था !

Sunday, March 1, 2009

शायद वो इधर आई होगी !

लो फिर खिल गईं बागों में कलियाँ,
किसी बेख्याली में वो मुस्कराई होगी !

कोयल भी भूल गई अपने गीत गाना,
बातों-बातों में हौले से वो खिलखिलाई होगी !

क्यों ठहर गया वक्त का अचानक ही चलना?
अलसाई सी, उसने ली अँगड़ाई होगी !

भीनी सुगंध मौसम में आई कहाँ से?
अपनी भीगी जुल्फें उसने बिखराई होंगी !

बदला-बदला सा है मेरे घर का हर पहलू,
आज भूले से शायद वो इधर आई होगी !

[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

Friday, February 27, 2009

बिंदिया माथे की मुझे बना लो न !

करवटें ले रहा ये मौसम है,
तुम भी पलकों को कुछ उठा लो न !

कैद मैं क्यों रहे जवानी अब ?
खुद को कलियों सा तुम खिला लो न !

रात की बेबसी पे रहम करो,
गेसु मुख से जरा हटा लो न !

बहुत खलती है सूनी पेशानी,
बिंदिया माथे की मुझे बना लो न !

निगाहें बेशुमार तकती हैं,
पहरे पर मुझको तुम बिठा लो न !


[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है]

Thursday, February 26, 2009

"संभल न पाना आँचल का…"

बिगड़ो न मस्त हवाओं पर, नहीं इनकी शैतानी है,
संभल न पाना आँचल का, यौवन कि निशानी है ।

छुटे मुक्त हँसी बचपन की, और आँखें शर्माती हों,
तो समझो, हर मौसम पर भरपूर जवानी है ।

पर, बोल गया चुपके से क्या कानों में बात कोई?
जब सोलह पूरे हो जायें, नहीं आँख मिलानी है ।

संकोच में यूँ ही गवांओगी, अपने जीवन को तुम,
फिर तरसोगी इस पल भर को, ये बात पुरानी है ।

आओ बैठो, कुछ कह लूँ मैं, कुछ कह लो तुम भी अब,
ढ़लते सूरज की बेला है, और शाम सुहानी है ।


[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है]

Monday, February 9, 2009

दिल तुम बिन डूबा जाता है !

गलहार बनी है मनोव्यथा,
उर पाती नहीं लिख पाता है,
अँसुओं से भीगा अंतस तक,
मन कुछ भी कह नहीं पाता है ।

अब गौण बनी सब खुशियाँ हैं,
फूल लगें सब शूल से हैं,
गगन-धरा का मिलन कभी,
किसी को नहीं सुहाता है ।

प्रारब्ध से मैं तो हार गई,
मन ही में मन की बात रही,
पर जब तुम सामने होते हो,
मुँह जाने क्यों सिल जाता है ।

चिर उनींदी तरसें अँखियाँ,
सपने भी कैसे लूँ तेरे,
आभास हवा में हो तेरा,
मन भाव-शून्य हो जाता है ।

पलकों पर बोझ सहूँ कितना,
तुम आ कर मुझे बता जाते,
हर श्वास में तेरी गन्ध छिपी,
दिल तुम बिन डूबा जाता है ।


Saturday, February 7, 2009

उनकी फितरत ही जब बेवफा हो गई !

तुझपे मेरी गज़ल आशना हो गई,
अश्आर की तू तो खुदा हो गई !

शब हो या फिर शबनम की वेला रहे,
सारी कायनात तुझपे फिदा हो गई !

हम थे पीते रहे जिसको मय मान के,
एक दिन वो गमों की दवा हो गई !

जान गिरवी थी पहलू में जिसके मेरी,
मौका पाते ही वो तो हवा हो गई !

दरो-दीवार पर सर पटकने से क्या,
उनकी फितरत ही जब बेवफा हो गई !

Tuesday, January 20, 2009

तुम दो पल हाथ थमा दो ना !

इतना प्रिय तेरा दर्द प्रिये, कुछ और दर्द मुझे दे दो ना,
सहलाओ चाहे न ज़ख्म मेरे, यादों का मरहम लगा दो ना !

तेरी प्रेम-सुधा वैतरणी में, अवसाद में डूबा-उतरा हूँ,
अपने नयनों की नाँव बना, मुझको तुम पार लगा दो ना !

दिन जल्दी-जल्दी ढ़लता है, पर रात बहुत ही लम्बी हो,
तुम हौले-हौले ख्यालों में आ कर मुझको थपका दो ना !

अधर में लटकी प्यास मेरी, तेरे अधरों से मिलन की है,
तुम अधरों को अपने दो पल, कभी मेरा नाम बता दो ना !

हर श्वास मेरी, हर आस मेरी, बस टिकी तेरे विश्वास पे है,
गिर के उठता, उठ के गिरता, तुम दो पल हाथ थमा दो ना !

Saturday, January 17, 2009

सपना !

तुम को
पाया भी न था कि
तन्हा हो गया
जिंदगी का
हरेक खुशनुमा लम्हा
जाने कहाँ खो गया
तेरे लबों की गर्मी से
अभी तक
झुलसता है तन मेरा

लहरा दे
जुल्फों के घने बादल
और
सरोबार कर दे
मेरी भावनाओं को
अन्तस तक -
अपने भीगे
पुलकित प्यार से -
बीता हर पल
यूँ लगे कि
अपना हो गया
तेरी मदहोश साँसों ने
घोल रखा है
अजीब सा नशा
मेरे आस-पास की हवाओं में
जागते हुए भी
देखता हूँ तेरे ही स्वप्न
नींद भी तो
आती नहीं अब
डरता हूँ
ये स्वप्न भी
टूट न जायें
अब तो
हर एहसास भी
तेरा ही
सपना हो गया !

Thursday, January 8, 2009

गज़ल !

चाँद उजला, जमीं भी उजली है,
चाँदनी तुझको देख निकली है !

सो गये हैं फलक पे तारे सभी,
मिलती उनको तुझसे बिजली है !

तू न हो तो नहीं ये गुंचे खिलें,
देख तुझको बहार मचली है !

बहुत भटके थे यूं वीराँ में,
तुम मिले तो जिंदगी संभली है !

जिंदगी तेरे बिन अधूरी थी,
तेरे दर पे ही जान निकली है !

Thursday, December 25, 2008

प्यार में दुनिया भी है खुदगर्ज हो गई !

तुम्हारी बेरूखाई तो सजा-ए-मौत हो गई,
रहम कुछ तो करो, हद तुम्हारी बहुत हो गई !

अख्तियार जिंदगी का तुमको था दे दिया मैंने,
हर बात तुम तक आ के ही तो खत्म हो गई !

दिल ये सोचने को अब तो है मजबूर हो गया,
जहाँ में मेरे लिये हर शै ही क्यों बदबख्त हो गई !

कोई तो जान यूँ ही दे, कोई ले लेता यूँ ही जान,
अब तो प्यार में दुनिया भी है खुदगर्ज हो गई !

Wednesday, December 24, 2008

चैन से मरने की इज़ाजत भी नहीं !

उनका इसरार है दिल टूटने पर बुरा तो मानो मत,
दर्द होने पर हमें उफ करने की इज़ाजत भी नहीं !

प्यास बुझ नहीं पाई समुन्दर के किनारे रह कर भी,
जाने क्यों खारा पानी पीने की इज़ाजत भी नहीं !

दो कतरे आँखों में आये तो वो भी छुपाने पड़ गये,
दुनिया के सामने दो आँसु बहाने की इज़ाजत भी नहीं !

उज़ाड़ ली दुनिया हमने तुम्हारी चाहत में सनम,
अब तो खँडहरों में घर बसाने की इजाजत भी नहीं !

जीते जी मर गया हो जो किसी की खातिर,
उसे तो यारो चैन से मरने की इज़ाजत भी नहीं !

Wednesday, December 17, 2008

मैंने कविता लिखना छोड़ दिया !

मैंने दर्द से रिश्ता जोड़ लिया,
खुशियों से है मुँह मोड़ लिया,
तुमको पाने की खातिर,
दुनिया से नाता तोड़ लिया !

बाज न आयें ख्याल तेरे,
हरदम ही सतायें ख्याल तेरे,
दिल को जाने क्या है हुआ,
कोई बात समझना छोड़ दिया !

अरसा हुआ कोई बात हुए,
उनसे अपनी मुलाकात हुए,
तुमसे मिलने के ख्याल ने ही,
बेसाख्ता दिल को झंझोड़ दिया !

मैं चलता रहा उस राह पे ही,
थे जिस पे तेरे कदमों के निशां,
भटका जब भी कभी राह था मैं,
राहों ने तेरी राह पे मोड़ दिया !

जब भी मैं कुछ लिखने बैठा,
खुद कलम लिखे कविता तेरी ,
जब से तेरा नाम है दिल पे लिखा,
मैंने कविता लिखना छोड़ दिया !

Sunday, November 16, 2008

जाने क्यों तुमको खटक गया !

मन जाने क्यों अटक गया,
त्रिशंकु में लटक गया,
हर राह वही, पहचान वही,
दिशा ये कैसे भटक गया !

नित नए स्वपन मैं बुनती थी,
काँटों से फूल मैं चुनती थी,
जिस सपने में तुम आते थे,
जाने वो कैसे चटक गया !

आहट सुन कर मैं ठिठकी थी,
अँखियाँ राहें ही तकती थीं,
तेरे आने के पल में क्यों,
अँखियों में रोड़ा रड़क गया !

मैं बाती बनी दीए की थी,
खुद जल जग तेरा रौशन किया,
बुझती लौ को कुछ तेल मिले,
जाने क्यों तुमको खटक गया !

Friday, October 24, 2008

न हो तुम जहाँ, कहाँ ऐसा जहाँ हो !

तेरी बेरुखी से वाबस्ता तो हैं हम,
पर इस दिल की हालत कैसे बयाँ हो ।

जो चोट तुमने मारी है दिल पर,
उस चोट का तुमको कैसे गुमाँ हो ।

कहते तो हो दोस्ती है हमारी,
क्या दोस्ती का यूँ ही इम्तहाँ हो ।

बेशक न समझो मेरे दिल की हालत,
इज़हार की पर यही तो जुबाँ हो ।

कोशिश तो है तुझे भूल जायें हम,
न हो तुम जहाँ, कहाँ ऐसा जहाँ हो ।

Thursday, October 9, 2008

तेरी छुई हर शै सुगन्ध हो गई!

तड़पने-तड़पाने की हद हो गई,
तुम्हे पाने की अब जिद हो गई ।

बेहोश होश में भी रहने लगे हम,
जिंदगी ख्वाब की मानिंद हो गई ।

कुछ और सुनाई देता नहीं अब,
तेरी आहट कानों में बुलन्द हो गई ।

परवाह काँटों की रही नहीं अब,
तेरी छुई हर शै सुगन्ध हो गई ।

दिल यूँ भी कम ही धड़कता था,
तेरे आने से धड़कन भी बन्द हो गई ।

Friday, October 3, 2008

नहीं दिल की बात बताते हो!

यूँ क्यों छिपते फिरते हो,
क्या तुम खुद से डरते हो,
कि हम कहीं जान नहीं जायें,
कि तुम भी हम पर मरते हो !

दिल ने कुछ तो करना है,
तुम्हे हाल तो अपना कहना है,
तुम मुँह से कुछ नहीं कहते हो,
बस खुद से बातें करते हो !

खुद पर तुम्हे भरोसा नहीं,
शक नाहक हम पर करते हो,
कोई और आये कैसे दिल में,
इस दिल में तुम ही रहते हो !

कभी आते हो, कभी जाते हो,
नहीं दिल की बात बताते हो,
हमसे तुम खेल तो करते हो,
खुद से भी धोखा करते हो !

Thursday, October 2, 2008

मुझे मिला है सब कुछ तेरे गम में हो गमगीं!

बार-बार भूल जाते हो तुम हमें,
और याद दिलाना पड़ता है कि हम हैं अभी ।

माना कि गरज मेरी है तुमसे अभी,
पर न भूलो कि दिन अपने भी आयेंगें कभी ।

चाहे कुछ भी सोच लो मेरे लिये,
सुकुँ है कि तेरे दिल में हम आये तो सही ।

यूँ तो खुशियों से दिल आबाद है होता,
मुझे मिला है सब कुछ तेरे गम में हो गमगीं ।

न दो चाहे कुछ भी है हमें मंजूर,
न छीनो हमें हमसे ही, रहम थोड़ा करो कभी ।

Thursday, September 25, 2008

हँस के थोड़ी सी जिंदगी जी लेंगें !

कहीं चिंगारी तेरे दिल में भी है,
नहीं तो यूँ धुआँ उठता ही नहीं ।

है ये उम्मीद कि जी उठेंगें हम,
वर्ना मैं तुम पे यूँ मरता ही नहीं ।

दिल की ये बात तुमसे कहनी है,
वर्ना बात तुमसे कुछ करता ही नहीं ।

अपनी तो छोटी सी कहानी है,
तुम न सुनते अपनी कहता ही नहीं ।

हँस के थोड़ी सी जिंदगी जी लेंगें,
तुम न मिलते तो मन यूँ हँसता ही नहीं ।

Wednesday, September 17, 2008

समझ मुझको उम्र-भर आया नहीं !

उठता रहा दिल से धुआँ,
उनको नज़र पर आया नहीं,
करता रहा दिल उनसे दुआ,
तरस उनको मेरे पर आया नहीं ।

मुलाकातें हुईं, कई बातें हुईं,
कुछ तुमने कहा, कुछ हमने कहा,
जो कहना था, सुनना था हमने मग़र,
उसका जिक्र तक आया नहीं ।

हम ढूँढें कहाँ, अपनी दर्दे-दवा,
कोई मिलता नहीं है अपना यहाँ,
हर रस्ता कहे, चल साथ मेरे,
इस दिल को सब्र पर आया नहीँ ।

कोई जुर्म नहीं, फिर भी मिलती सज़ा,
ये कैसी मिली है मुझको कज़ा,
हर पल क्यों मरूँ, दे कोई बता,
समझ मुझको उम्र-भर आया नहीं ।

कोई हो आसमाँ, या हो कोई ज़मीं,
जहाँ खुशियाँ मिलें, न हो कोई ग़मीं,
मतलब की दुनिया में मुमकिन नहीं,
मेरे दिल को नहीं पर आया यकीं ।

Thursday, August 28, 2008

गज़ल !

बार-बार भूल जाना हमें, फितरत है तेरी,
और याद दिलाना पड़ता है कि हम हैं अभी ।

माना की गरज़ मेरी है तुमसे मिलने की अभी,
ये न भूलो कि दिन अपने भी आयेंगें कभी ।

सोचना चाहो जो कुछ भी सोच लो मेरे लिये,
हमें सुकूँ है तेरे दिल में ख्याल आया तो सही ।

यूँ तो खुशियाँ पाने से ये दिल आबाद है होता,
मिल गया मुझे सब कुछ तेरे ग़म में हो गमगीं ।

नहीं देना जो चाहो हमें कुछ भी तो है मंजूर,
न छीनो हमको हमसे ही, रहम थोड़ा करो कभी ।

Monday, August 25, 2008

कोई रास्ता बताओ!

तुम्हारी यादों का आवरण
आँखों से हटे
तो मैं दुनिया देखुँ
यूँ तो
धुंधला सी गई है
तुम्हारी तस्वीर मेरी आँखों में
पर इसकी धुंधलाहट
मेरी दृष्टि को भी
कुछ-कुछ धुंधला सी गई है
इस धुंधलेपन के कारण
मैं देख नहीं पाता हूँ
अपने वर्तमान को
तो कल की तस्वीर
कैसे नज़र आयेगी मुझे
न आज अपना
न कल पर भरोसा
ये सोच-सोच कर
मेरी सोच
कुछ झुंझला सी गई है
अब या तो
तुम हकीकत में आ ही जाओ
या फिर
कोई ऐसा रास्ता बताओ
कि तुम्हारे आवरण को
तुम्हारी तस्वीर को
अपनी आँखों के सामने से
हटा पाऊँ
अपने मन के परदे से
मिटा पाऊँ
तभी देख पाऊँगा
जीवन के इन पथरीले रास्तों को
और तुम तक पहुँच पाऊँगा
इसी विश्वास को
जिंदगी पर
बार-बार झुठला सी गई है!

Tuesday, July 22, 2008

चाँद निकला है फिर से तेरे लिये !

चाँद निकला है फिर से तेरे लिये,
तुम भी अपनी नकाब खोलो ज़रा ।

होश पहलु में तेरे आयेगा,
दो लफ्ज़ प्यार के तो बोलो ज़रा ।

जिंदगी यूँ ही कैसे काटोगे,
पल दो पल किसी के हो लो ज़रा ।

ख्वाब तुम भी तो लेती होगी कभी,
प्रेम माला में भी पिरो लो ज़रा ।

दिन गुज़र जायें, रात थमती नहीं,
कुछ हँसीं पल भी तो संजो लो ज़रा ।

Wednesday, July 2, 2008

आप बरबस याद आयेंगें!

जिंदगी
कोई किताब
या
डायरी तो नहीं
जिसमें से
अतीत के पन्ने
जब चाहें
फाड़ कर फेंक दें
समय के साथ-साथ
जिंदगी के पन्नों पर
परत-दर-परत
गर्द तो
जम जाती है
पर
जब भी
कोई बात
इस गर्द को
कुरेद जाती है
तो
अच्छे-बुरे पलों की
याद तो
दिला ही जाती है
और
दिल को तड़पा जाती है
किसी को
ग़र आता हो
जिंदगी की किताब से
अतीत के
पन्नों को फाड़ना
तो हमें भी बताये
वर्ना
यादों की किताब को
चिता के साथ ही
जलायेंगें
तब तक तो
आप
हमें याद आयेंगें !
बरबस ही याद आयेंगें !!

Wednesday, June 18, 2008

एक ही ग़ल्ती हर बार क्यों करें !

जो हमसे प्यार न करें, उन्हे हम प्यार क्यों करें,
ग़मों का दिल में अपने यूँ ही हम अंबार क्यों करें ।

नहीं हैं मुश्किलें अपनी ज़हाँ में पहले से ही कम,
तो फिर ख़ारों से राहों को हम सरोबार क्यों करें ।

जिन्हे फुर्सत नहीं नज़रें उठा के देख लें हमको,
तो बेकार नज़रें उनसे हम दो-चार क्यों करें ।

किसी को न ज़रूरत हो हमारी अपने जीवन में,
बिना जाने ही उस पर हम कहो एतबार क्यों करें ।

वक्त तो कट ही जायेगा, हमारा भी, तुम्हारा भी,
तो फिर हम एक ही ग़ल्ती कहो हर बार क्यों करें ।

Thursday, May 22, 2008

उनकी याद मुझको भिगोती रही !

रात भर सपनों की बरसात होती रही,

उनसे बार-बार मुलाकात होती रही,

अन्तस तक मुझे सरोबार करके,

उनकी याद मुझको भिगोती रही ।




ख्याल उमड़-घुमड़ कर आते रहे,

ज़हन में तस्वीर तेरी चमकाते रहे,

अधखुली आँखों से जगी-सोई सी मैं,

हर लम्हा सपनो में पिरोती रही ।




मौसम दिल का सुहाना होता गया,

आबाद मेरा वीराना होता गया,

वो आते रहे और जाते रहे,

यूँ ही उनकी इनायत होती रही ।




सूखे पत्तों की डाली सा जीवन मेरा,

ग़म की आँधी से था लरज़ता हुआ,

प्यार की बौछार लाई हरियाली नई,

मुझको नित नई सौगात मिलती रही ।




बरसात इतनी हुई, ज़लज़ला आ गया,

प्यार में बहने का सिलसिला हो गया,

थाम हाथ तेरा डूब जायेंगें हम,

प्यार की यूँ ही इबादत होती रही ।


Saturday, May 17, 2008

अँखियाँ हैं भीगीं अँसुवन से !

अँखियाँ हैं भीगीं अंसुवन से,
जब से तुम आये हो मन में !



कर-कर गुहार मैं हार गई,
तेरी याद मुझे है मार गई,
अँखियों में बस के जाने कहाँ,
तुम खोये हो इस जीवन में !



राहें भी पूछें राह तेरी,
हर चाह में बसती चाह तेरी,
ग़र चाहत को ठुकराना था,
नहीं मिलना था मुझे यौवन में!



फूलों संग काँटे मिलते हैं,
नहीं फूल अकेले खिलते हैं,
ये जान के भी चुन बैठी मैं,
काँटों की दुनिया गुलशन में !


Friday, May 16, 2008

नया गीत मैं रचता जाऊँ!

तुझे याद मैं करता जाऊँ,
नया गीत मैं रचता जाऊँ !

तेरी ज़ुल्फें घनी सुनहरी,
अँखियाँ काजल से गहरी,
तेरे होठों में वो रस है,
ख्वाबों में चखता जाऊँ !

तेरी चाल बड़ी मदमाती,
हिरनी के मन को भाती,
बलखाती चोटी में मैं,
बेबस ही उलझता जाऊँ !

कोमल सी बाहों में जब,
महरून चूड़ियाँ खनकें,
मधुरिम उनकी धुन में
मदहोश हो गाता जाऊँ !

Sunday, May 11, 2008

शेष सब स्वयँमय होगा !

इशारों को
शब्दबद्ध कर
कविता में
गूंथ रहा हूँ
इनकी माला
नयनों के
कोरों से उठा
अपने
ह्रदय रूपी
मंदिर को
पहनाओगी
तो जीवन
सुगन्धमय होगा !
अपनी
भावनाओं की
सरिता को
कलमबद्ध कर
तुम तक
पहुँचा रहा हूँ
इनमें
सहज ही
उतरोगी तो
जीवन के
भँवर में
तैरना
आनन्दमय होगा!
तुम्हारा-मेरा
अंकुरित होता प्यार
जब
हवाओं की
लहरों पर
अठखेलियाँ करता
स्वरबद्ध होगा
तो जीवन
संगीतमय होगा !
आओ
एक-दूसरे से
बंध जायें
इक-दूसरे में
खो जायें
सभी
गिले-शिकवे छोड़
सभी
बंधन तोड़
हम
एक हो जायें
शेष सब तो
स्वयँमय होगा !

Wednesday, May 7, 2008

नहीं जाने कल फिर कौन कहाँ !

सपनों में मन की कहती हो,
पर, सामने तुम चुप रहती हो,
मैं सपने को सच मानुँ,
या फिर मानुँ तेरे मौन को हाँ !

हम कब से बैठे दुविधा में,
कब आओगे तुम चल करके,
ये राहें कर लो एक प्रिये,
नहीं जाने कल फिर कौन कहाँ !

हर साँस में तेरी सुगंध बसी,
तुम बिन कुछ भी न लगे हसीं,
ग़र सपनों में आ सकती हो,
तो जीवन में तुम क्यों हो खफा !

Monday, May 5, 2008

क्यों यूँ तड़पाती हो !

चुपके से आती हो,
इस दिल में समाती हो,
मैं समझ नहीं पाता,
क्यों यूँ तड़पाती हो ।

जब आँख लगे मेरी,
तो पास तुम्हे पाऊँ,
और दिन के उजाले में,
तुम्हे देख नहीं पाऊँ,
हर बार यही किस्सा,
तुम क्यों दोहराती हो ।

कोई आहट जब होती,
आभास तेरा होता,
तुम आती ही होगी,
विश्वास मेरा होता,
पट खोल के देखुँ तो,
तुम सब झुठलाती हो ।

ग़र प्यार मेरा तुमसे,
इकतरफा ही होता,
तो तेरे ख्यालों में,
मैं यूँ ही क्यों खोता,
तुम अपने मन की बात,
नहीं क्यों बतलाती हो ।

जो लहरें ख्यालों की,
आती हैं तेरे घर से,
यूँ ही तो नहीं देती,
दस्तक मेरे दर पे,
मैं यूँ ही पागल हूँ,
क्या ये समझाती हो ।

Saturday, May 3, 2008

तुम पर कविता कैसे मैं करूँ!

तुमको इतना मैंने चाहा है,
मेरे दिल ने इतना सराहा है,
जो रोम-रोम में बसता हो,
उस पर कविता कैसे मैं करूँ !

रूप नया हर रोज़ मिले,
दपर्ण भी है हैरान बड़ा,
क्या सोच के तुमको,मेरी प्रिय,
ऊपर वाले ने तुझको घड़ा,
तुम खुद में ही इक कविता हो,
तुम पर कविता कैसे मैं करूँ !

कुदरत ने तुझमें रंग भरे,
चंदा भी तुझको नमन करे,
स्वपनिल जीवन की खुशियाँ भी,
नयनों में तेरे शयन करे,
तुम पूर्णता की सरिता हो,
तुम पर कविता कैसे मैं करूँ !

जब आ जाओ, जीवन जागे,
हर पल तुमसे साँसें माँगे,
गर्मी की धूप हो मनभावन,
बिन सावन के बरसे सावन,
जिससे बस नूर टपकता हो,
उस पर कविता कैसे मैं करूँ !

Friday, May 2, 2008

मैं क्या करूँ !

तेरी याद सताती है,
मैं क्या करूँ!
दिन-रात जगाती है,
मैं क्या करूँ !
कोई तदबीर तुझे भुलाने की,
नहीं राह सुझाती है,
मैं क्या करूँ!

हर वक्त का रोना भी तो, अच्छा नहीं है,
बिन पाये खोना भी तो, अच्छा नहीं है,
पर कोई भी बात जिंदगी की,
नहीं हंसाती है,
मैं क्या करूँ!

बुरा क्यों मानते हो, ग़र प्यार जताते हैं,
दूर क्यों भागते हो, जब पास बुलाते हैं,
कोई भी शै तुझ बिन,
नहीं भाती है,
मैं क्या करूँ !

Thursday, May 1, 2008

सच कहने से वो बिगड़ते हैं !

हम तो सीधी सी बात कहते हैं,
वो तो कुछ और ही समझते हैं ।

जिनको रिश्ता निभाना आता नहीं,
वो बिना बात के अकड़ते हैं ।

शिकवा-गिला कोई करे कैसे,
सच कहने से वो बिगड़ते हैं ।

बात बनती रहे, बिगड़ती रहे,
यूँ ही तो साथ-साथ चलते हैं ।

दर्द का माप नहीं होता कोई,
अपना पैमाना सभी रखते हैं ।

नहीं मुश्किल है ज़ख्म देना कभी,
बड़ी मुश्किल से पर ये भरते हैं ।

Monday, April 28, 2008

हसरतों की नुमायश हो ही गई !

हसरतों की नुमायश हो ही गई,
तुमसे मिलने की ख्वाहिश हो ही गई ।


जो न भूले से कभी तकते थे,
दिल में उनके भी खलिश हो ही गई ।


रोज़ कहते थे दिल की सुन लो कभी,
आज उनकी फरमाईश हो ही गई ।


दिन-ब-दिन फासले भी घटते गये,
दूरियों की पैमाईश हो ही गई ।


लाख कहते रहो हमारे नहीं,
तेरे दिल की सिफारिश हो ही गई ।

Sunday, April 27, 2008

हमने देखा उसे भटकते हुए !

चाँद सोया नहीं है सदियों से,
जाने क्या ढ़ूँढ़ता है सदियों से ।

हमने देखा उसे भटकते हुए,
छत पे,आँगन में,सूनी गलियों में ।

रास तारे भी नहीं आयें इसे,
जाने क्या देखा इसकी अँखियों ने ।

रफ्ता-रफ्ता ये रोज़ घटता रहा,
इसको देखा है मरते कईयों ने ।

चांद का दर्द नहीं समझा कोई,
कही अपनी ही जग में कवियों ने ।

फिर भी देखो ये चाँद खिलता रहा,
दिल की कहता रहा शैदाईयों से ।

Monday, April 14, 2008

गज़ल!

रात तन्हा थी, मैं भी तन्हा था,
फिर भी दोनों को रहना तन्हा था ।

तोड़ कर ले गये गुलिस्ताँ से,
नाम जिस गुल पे मेरा अपना था ।

दास्ताँ क्या ये मेरे लब कहते,
जो भी सुनता था, यूँ ही हँसता था ।

कोई उम्मीद न थी किनारों से,
घर मेरा बीच धार बसता था ।

कीमती थे सभी तुम्हारे लिये,
बस मेरा दिल ही सबसे सस्ता था ।

Sunday, April 13, 2008

गज़ल!

ताउम्र समेटता रहा दर्द मैं यारब,
अब दर्द ही मेरा खुदा हुआ है यारब ।

हर बात नहीं सबसे कहता है हर कोई,
मेरे दिल की बात समझ कभी तो यारब ।

मैं ख्वाब देखता रहा तुझसे मिलने के,
कोई कर तू भी तदबीर कभी तो यारब ।

सुनसान पड़े हैं रास्ते, सूनी हैं गलियाँ,
कभी हमको भी खुशियाँ अता कर यारब ।

कोई मकसद मिलता नहीं हमें है जीने का,
यूँ तो जीने को जीते सभी हैं यारब ।

Sunday, April 6, 2008

गज़ल!

ग़म मिलते रहे मुझे बेइन्तिहा, मैं समझता रहा उन्हे इम्तिहां,
कोई वादा किसी ने किया तो न था, पाले रहे हम यूँ ही गुमां ।

तोड़ना चाहा तारे बढ़ा के ये हाथ, आसमाँ ऊँचा लेकिन होता गया,
दूर से दिखते हैं मिलते हुए, जमीं आसमाँ लेकिन हैं मिलते कहाँ ।

हमने देखा हैं रंगों को खिलते हुए, बूंदे बारिश की फैली फलक पे हों जब,
तिलिस्म सपने सारे आँखों के हैं, बाद बारिश के दिखते हैं रंग कहाँ ।

कोई तकदीर को कैसे साथी कहे, वो तो अपनी ही मर्जी से चलती चले,
कौन जाने दग़ा देगी किस मोड़ पर, उसके हाथों में खेला है सारा जहाँ ।

वक्त किसी के लिये तो ठहरता नहीं, मोड़ना कर्म से कभी मुहँ को नहीं,
तू जहाँ से, तुझसे जहाँ है बना, तू नहीं तो जहाँ भी कहाँ है रहा ।

Friday, April 4, 2008

सब दिल की बात है यारा !

सब दिल की बात है यारा,
कोई लगता यूँ ही प्यारा,
कोई नफरत का है मारा,
दुनिया का अजब नज़ारा !

कहीं बात बने बिन बात के,
कोई तड़पे बिना किसी साथ के,
दिल को यूँ न लुटा तू यारा,
ये सब चीजों से न्यारा !

दो लफ्ज की सारी कहानी,
रिश्ते सारे हैं फानी,
मत भूल ये सच तू यारा,
फिर चोट मिलेगी दोबारा !

मतलब की दुनिया है सारी,
यहाँ प्यार बना है भिखारी,
न माँग किसी से तू यारा,
बस कर ले सबसे किनारा !

मेरी राख उड़ेगी जब भी,
आँखों में उनके चुभेगी,
अफसोस न कर तू यारा,
वो लें गें नाम हमारा !

Thursday, April 3, 2008

गज़ल!

ताउम्र समेटता रहा दर्द मैं यारब,
अब दर्द ही मेरा खुदा हुआ है यारब !

हर बात नहीं सबसे कहता है हर कोई,
मेरे दिल की बात समझ कभी तो यारब !

मैं ख्वाब देखता रहा तुझसे मिलने के,
कोई कर तू भी तदबीर कभी तो यारब !

सुनसान पड़े हैं रस्ते, सूनी हैं गलियाँ,
कभी हमको भी खुशियाँ अता कर यारब !

कोई मकसद मिलता नहीं हमें है जीने का,
यूँ तो जीने को जीते सभी हैं यारब !

Tuesday, April 1, 2008

दिल बच्चे में बदल गया !

तुमसे
मिलने के बाद
ये दिल
बच्चे में बदल गया
और
तुम्हे पाने को मचल गया
इसी
उधेड़बुन में
लगा रहता है दिल
कि जब तुमसे
मुलाकात हो
तो कैसे
मन की बात हो
तुम मिले भी
बात भी हुई
पर तुम्हारे सामने
दिल की ज़ुबां न खुली
चलो, मिल तो लिये
सोच, दिल बहल गया
पर
हर मुलाकात के बाद
बैचेनी कुछ और
बढ जाती है
तेरे साथ
गुजरे पलों की
याद सताती है
यहाँ तक कि
रातों की नींद भी
उड़ जाती है
पर भोर की
ठडी हवा
तुमसे मिलने की
एक और उम्मीद
जगा जाती है
और दिल
फिर खुश हो जाता है
चलो, नई उम्मीद का
नया दिन
फिर निकल गया !

Thursday, March 27, 2008

गज़ल !

तुम्हे भुलाने की कोशिश में खुद को भुला बैठे,
खुशियाँ पाने की चाहत में खुशियाँ गवाँ बैठे ।

तुम तो आसमान में चाँद-सितारों में बसी थीं,
हम यूँ ही सितारों की ख्वाहिश बना बैठे ।

सच तो यही है कि दिल वो रखते ही नहीं थे,
न जाने क्या सोच के अपना दिल लुटा बैठे ।

वैसे तो कमी न थी दुनिया भर में ग़मों की,
तो फिर तुम्हारे और ग़म हम क्यों जुटा बैठे ।

आँसुओं से पहले ही सरोबार था दिल का आशियाँ,
फिर और आँसुओं की सौगात क्यों बुला बैठे ।

Wednesday, March 26, 2008

तुमसे हमारा रिश्ता ही क्या था?

तुमसे हमारा रिश्ता ही क्या था,
जो मन की बात कह बैठे,
अपनी बात कह कर,
हम बात भी खो बैठे !

दिल लगाने के लिये दिल भी तो होना चाहिये,
और उस दिल में कुछ जगह भी तो चाहिये,
जो जानते न हों दिल की बातें,
क्यों हम उनको दिल दे बैठे !

पत्थर तो होता नहीं शीशे की मानिंद,
कि अपना चेहरा उसमें दिख जाये,
जिन्हे आईना भी कुछ न दिखा पाये,
वो खुद से भी शर्म नहीं करते !

Monday, March 24, 2008

गज़ल

तुमने जो मुझे था ठुकरा दिया,
मुझे मेरी ही नज़र में गिरा दिया ।

चैन ले लिया मेरा तुमने मगर,
इक कतरा भी खुशी का न दिया ।

खो गये होश कैसे क्या कहुँ,
एक भी घूँट मय का न था पिया ।

दिल तुम्हारा, जान भी तेरी हो गई,
फिर न जाने मैं कैसे था जिया ।

दरबदर भटकते हैं याद में तेरी,
चैन का मिलता नहीं कोई भी ठीया ।

Saturday, March 22, 2008

रोज खेलुँ होली!

हया के रंग,
प्रेम की रंगोली,
बात की बात में,
कोई किसी की होली!

पी का मनुहार,
बना गलहार,
चुपके-चुपके खेलुँ,
उनसे आँख मिचौली !

सपनों की बारात,
भावना की वेदी,
तारों की छाँव में,
उठी मन की डोली!

अंतस तक,
उनके भिगो गये नैना,
रंग में उनके रंग के,
रोज खेलुँ होली !

Thursday, March 20, 2008

मुझे भूलने को मत कहना !

तुम्हे न पाने का
उतना दर्द नहीँ होगा
जितना तुम्हे
भुलाने की
कोशिश में होगा
इसलिये
मुझे ये मत कहना
कि
तुम्हे भूल जाऊँ
और
दुनिया की
मसरूफतियों में
मन लगाऊँ
मैं जानता हूँ
मुझसे ये न होगा
जीवन का
हर क्षण, हर पल, हर मोड़
तेरी याद लिये
मेरे सामने खड़ा होगा
और
तेरी कमी का एहसास
दिल को महसूस होगा
कौन जानता है
ये रास्ते हमें कहाँ ले जायें
पर हर रास्ते के
हर मील पर
तेरे नाम का पत्थर
खुदा होगा
यूँ तो
चलते चलेंगें इन रास्तों पर
हम भी और तुम भी
पर आँखों का इन्तजार
हर राह पर
तुम्हे ढूँढता होगा
इसलिये
मत कहना हमें
कि
भूल जाऊँ तुम्हे
ग़र ये हो सकता
तो मैं
कहता ही नहीं तुम्हे
कि
मुझे ये मत कहना
कि तुम्हे भूल जाऊँ !

Monday, March 17, 2008

इतना तो हक दिया होता !

तुम्हे जब चाहूँ याद कर लूँ,
इतना हक तो दिया होता ।
ख्यालों में तुमसे मुलाकात कर लूँ,
इतना हक तो दिया होता ।

वैसे तो कोई रिश्ता न था अपना,
तुमसे कोई वास्ता न था अपना,
कोई रिश्ता न सही, कोई वास्ता न सही,
बात करने का हक तो दिया होता ।

सवालों के धेर में पड़ गया दिल,
तेरे फेर में पड़ गया दिल,
कोई रास्ता न कदमों को सूझे अब,
अपने घर का पता तो दिया होता ।

चल पड़े हम यूँ डगमगाते से,
तेरे तीरे नज़र से तड़पड़ाते से,
कोई खाने को बैठा है खुशी से,
नज़रों का इक वार तो किया होता ।

Saturday, March 15, 2008

क्या भूल पाओगी मुझे?

तुम मुझे
भूल जाने का
वादा करो
तो मैं भी
तुम्हे भूल जाने की
कोशिश करूँगा
पर क्या
ये वादा कर पाओगी?
मैँ जानता हूँ
किसी के लिये भी
किसी को भूल जाना
इतना आसाँ नहीं होता
इसलिये
मैं जानता हूँ
मुझे भूल जाना
तुम्हारे लिये
इतना आसाँ तो न होगा
फिर मुझसे
तुम्हे भूल जाने की
बात तो मत करो
फिर भी मैं
कोशिश करूँगा
तुम्हे भूल जाने की
क्योंकि
तुम खुश रहो
इसी में मेरी खुशी होगी
पर मुझे
इल्ज़ाम न देना
ग़र तुम्हे याद करने की
भूल कर बैठूँ
और मेरे दिल से
निकली कोई लहर
तुम्हारे दिल को छू जाये
और
मेरी याद दिला जाये
और तुम्हे
फिर से तड़पा जाये!

Friday, March 14, 2008

तुम मेरी चाहत हो!

तुम मेरी चाहत हो,
इस दिल की राहत हो,
या खुदा, मेरा खुदा तुम हो,
सुंदर सी इबादत हो !

दो लम्हे तेरे संग पाऊँ मैं,
तो जीवन लुटा जाऊँ मैं,
हर रास्ता तेरे घर जाता हो,
मेरे घर में तेरी ही मूरत हो !

धड़कन में तेरे ही चर्चे हों,
गुलशन में खिले तेरे गुन्चे हों,
राहों पे तेरे कदमों के निशां,
मिल जायें हमें तो इनायत हो!

गज़ल

तुम क्या गये मेरी कविता ले गये,
मेरी प्रेरणा, मेरी विधा ले गये ।

अस्त-व्यस्त से सारे ख्याल हो गये,
भाव सभी अपने साथ ले गये ।

कद्रदानों की यूँ तो कोई कमी न थी,
बस तुम्ही तो हमें धता दे गये ।

दोस्त जिन्हे कहा दुनिया के सामने,
वक्त पर वही तो दगा दे गये ।

अब ना माँगेंगें कभी किसी से कुछ,
अब तक के ग़म ही मेरी जाँ ले गये ।

Wednesday, March 12, 2008

तुम कुछ कहो न कहो!

तुम कुछ कहो न कहो,
बस मेरे मन में रहो,
तो मन की बात खुद ही हम समझ जायेंगें ।
तुम हमें मिलो न मिलो,
संग मेरे चलो न चलो,
किसी रस्ते पे कभी तो तुमसे मिल जायेंगें ।


ये दिल तो पागल है,
तुम्ही से घायल है,
जहाँ की सारी खुशियाँ छोड़ तेरा ही कायल है,
तुम मेरी सुनो न सुनो,
तुम मेरी बनो न बनो,
ज़ुबां पे नाम तेरा ही तो हम लायेंगें ।

तुम कुछ कहो न कहो,
बस मेरे मन में रहो,
तो मन की बात खुद ही हम समझ जायेंगें ।


बात अधूरी है,
दिलों में दूरी है,
समझ नहीं आता है कि क्या मज़बूरी है,
रंग में ढ़लो न ढ़लो,
हमसे खुलो न खुलो,
मुहँ के भाव लेकिन सब बता जायेंगें ।

तुम कुछ कहो न कहो,
बस मेरे मन में रहो,
तो मन की बात खुद ही हम समझ जायेंगें ।

Tuesday, March 11, 2008

शायद कभी तो प्यार जगेगा!

तुम हमें
नहीं चाहोगे
तो
ऐसा तो नहीं होगा
कि हमें
कोई और
चाहने वाला
नहीं मिलेगा
लेकिन हमें
तुम्हारा
अपनी जिंदगी में
न होना
कभी तो खलेगा
जिंदगी यूँ तो
छोटी सी ही है
रस्ते भी
गोल-मोल ही हैं
इस उम्मीद में कि
कभी तो
कहीं तो
तुम्हारा साथ मिलेगा
हमारा तन्हा वक्त
रफ्ता-रफ्ता कटेगा
और यही
इंतजार रहेगा
कि शायद
चुपके से
तेरे मन में भी
कभी तो
हमारे लिये
प्यार जगेगा
और तेरा दिल कहेगा
कि
मुझसा चाहने वाला
तुम्हे
कभी कहीं नहीं मिलेगा !

Monday, March 10, 2008

गज़ल!

लाख कोशिश करी भुलाने की, फिर भी तेरा ख्याल आ ही गया,
तुझसे नाता नहीं है कोई, मग़र, लब पे सब के सवाल आ ही गया ।

यूँ ही तो काटने की सोची थी तेरे बिन जिंदगी की राहों को,
फिर भी न जाने क्यूँ अचानक से इसमें बवाल आ ही गया ।

हम तो तुमसे गिला नहीं करते, प्यार तो दिल की एक चाहत है,
तेरी चाहत हमें मिली न क्यों, सोच दिल को मलाल आ ही गया ।

बंद अपनी ज़ुबाँ को रखेंगें, तुमको रुसवा न होने देंगें कभी,
इस दिल का लेकिन करें क्या, चेहरे पे इसका हाल आ ही गया ।

Sunday, March 9, 2008

गज़ल!

तुम ग़र कहोगे तो तुम्हे प्यार नहीं करेंगें,
पर ये तो बताओ तुम बिन कैसे जियेंगें ।

तुम्हारे मन में कुछ नहीं तो कुछ न सही,
हम तो फिर भी तुम्हे मन की कहेंगें ।

साथ चलना न था तो राह दिखाई थी क्यों,
ये भी न सोचा तुम बिन अकेले ही भटकेगें ।

माना कि अपनी खुशी में खुश रहना था तुम्हे,
हम भी तेरे ग़म में ही खुश रह लेंगें ।

कोई बात तो हमारी रख ली होती हमारी खातिर,
चलो, खुद से ही हम शिकवे-गिले कर लेंगें ।

Saturday, March 8, 2008

गज़ल!

सिर झटक के ज़ुल्फें बिखरने दीजिये,
धरा को आसमान से मिलने दीजिये ।

दिल यूँ भी काबू में रहता था कहाँ,
इसे ज़रा और भटकने दीजिये ।

हर सवाल का ज़वाब तुम्ही पे खत्म हो,
हमें जी भर सवाल करने दीजिये ।

ख्वाहिशों की फेहरिस्त बढ़ती जा रही है,
इन्हे कहीं पर तो रुकने दीजिये ।

बहुत जी लिये हम यूँ ही तन्हा-तन्हा,
अपने दर पर हमें मरने दीजिये ।

Friday, March 7, 2008

गज़ल!

ये दिल शीशा नहीं जो टूट के जुड़ न सके,
प्यार की मलहम लगवा कर तो देखो ज़रा ।

आईना तो कह जायेगा सच्ची बात सनम,
दिल के आईने में झाँक के तो देखो ज़रा ।

तुम खुद से ही बात कर के रो लेते हो क्यों,
हमसे दिल की बात कह के तो देखो ज़रा ।

हम भी ज़ुदा तो नहीं हैं दुनिया से लेकिन,
कभी हमको आज़मा कर के तो देखो ज़रा ।

कब तक चुपचाप बैठे रहोगे ग़मगीन हो कर यूँ,
मेरी नज़रों से दुनिया पहचान के तो देखो ज़रा

Wednesday, March 5, 2008

गज़ल!

तुम बिन मेरी कविता अधूरी ही रह गई,
दिलों में जो दूरी थी, दूरी ही रह गई ।

चाहा था तस्वीर तुम्हारी शब्दों में उतार लूँ,
तेरे बिन शब्दों की भी मजबूरी ही रह गई ।

तुम आओ तो बहारें भी आ जायें चुपके से,
तुम बिन शाम भी बिन सिंदूरी ही रह गई ।

थक गये इल्तज़ा कर कर के उनसे प्यार की,
जाने क्यों मेरी सदा बिन मंजूरी ही रह गई ।

दुश्मनों को भी दोस्तों का दर्जा दे बैठे थे हम,
तभी तो हर बात मेरी अधूरी ही रह गई ।

Tuesday, March 4, 2008

गज़ल!

तेरी याद में जी लेंगें, तेरी याद में मर लेंगें,
तू चाहे न चाहे, तुझे प्यार तो कर लेंगें ।

कोई रात न ऐसी हो, तेरे ख्वाब न आते हों,
तू आये न आये, दीदार तो कर लेंगें ।

कोई बात न ऐसी हो, जब जिक्र न तेरा हो,
तू बात करे न करे, तेरी बात तो कर लेंगें ।

मैं हरदम जलता हूँ, तेरे इश्क की गर्मी में,
सब मरने पर जलते, हम जिंदा जल लेंगें ।

क्यों पाली मजबूरी, इस दिल ने मुहब्बत की,
लगता है ग़म में तेरे, दुनिया से चल देंगें ।

Sunday, February 24, 2008

गज़ल!

क्या ज़रूरत है बेवफाई का सबब जानने की,
जो प्यार न करें, उनसे प्यार माँगने की ।

दर्दे-दिल उनका दिया दिल में ही रहने दो,
उनकी मंशा नहीं है मेरा दर्द बाँटने की ।

दो लफ्ज़ भी ग़र कह देते अपनी ज़ुबाँ से वो,
वजह मिल जाती हमें हयात काटने की ।

दिल तो हमने ही दिया है बिन माँगे उनको,
फिर तकलीफ क्यों हो हमें दिल हारने की ।

बेशक न रखते वो मेरा दिल अपने पास,
पर तदबीर तो न करते वो हमें मारने की ।

Friday, February 22, 2008

ऐसा क्यों है?

नींद हमारी, ख्वाब तुम्हारे,
ऐसा क्यों है, कोई बता दे ।

सोच हमारी, ख्याल तुम्हारे,
ऐसा क्यों है, कोई बता दे ।

दिल है हमारा, बसते वो हैं,
ऐसा क्यों है, कोई बता दे ।

आईने में बस अक्स तुम्हारा,
ऐसा क्यों है, कोई बता दे ।

मस्त पवन भी उन्हे बुलाती,
ऐसा क्यों है, कोई बता दे ।

Thursday, February 21, 2008

गज़ल!

मेरी सोच तुम पर ही अटक गई,
जिंदगी इसी मोड़ पर भटक गई ।

आँखें जब भी बंद करता हूं कभी,
तेरी तस्वीर आँखों में मटक गई ।

यूँ तो खुश रहता है मन बेवजह,
तेरी कमी ही जीवन में खटक गई ।

आँखें जब-तब खोजने लगती हैं तुम्हे,
तुम्हारी याद ज़हन में खनक गई ।

कभी मिल जाओगे अचानक ही राहों में,
इसी आस में ये अंखियाँ चमक गईं ।

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Wednesday, February 20, 2008

गज़ल!

मेरे दिल पे दस्तक दे कर चुपचाप क्यों बैठे हो,
कुछ बोलो, कुछ तो कह दो, किस सोच में डूबे हो ।

फिर आयें या न आयें खुशियों के ये पल हैं,
हाथ बढा कर ले लो, क्यों खुशियों से रूठे हो ।

रहना है दुनिया में ही, चाहे दुख हो चाहे सुख,
इक छोटी सी ठोकर से, क्यों दुनिया से टूटे हो ।

दुख में भी हँसना सीखो, कितना ही भारी हो,
कुछ मीठे बोल भी बोलो, चाहे वो झूठे हों ।

देखो जो खोल के आँखें, सब और बसा दुख है,
अपना ही दुख क्यों सोचो, क्या सबसे अनोखे हो ।

Tuesday, February 19, 2008

मेरे दिल में…

मेरे दिल में तू ही तू है,
धड़कन में तू ही तू है ।

कह दूँ मैं कैसे ये बता,
मेरे दिल में क्या है छुपा,
सवालों में तू ही तू है,
जवाबों में तू ही तू है ।

खुशबु तेरी है फिज़ाओं में,
तैरे तू ही है घटाओं में,
साँसों में तू ही तू है,
निगाहों में तू ही तू है ।

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Monday, February 18, 2008

गज़ल!

ताउम्र नहीं भूल पाऊँगा तुम्हे,
तेरी बेवफाई याद आती रहेगी हमें ।

दो अश्क बहाने से फायदा क्या है,
ग़म की मार तो खाती रहेगी हमें ।

बार-बार इल्तज़ा की, बार-बार ठुकरा दिया,
यही बात तो सताती रहेगी हमें ।

दिल का आईना चटक के चूर-चूर हुआ,
तस्वीर हर टुकड़े में नज़र आती रहेगी हमें ।

इक कली ही तो माँगी थी गुलशन से हमने,
जाने क्यों तकदीर काँटे चुभाती रहेगी हमें ।

Saturday, February 16, 2008

गज़ल!

कब तक खुद से दिल की बात छुपाओगी,
खुद भी तड़पोगी और हमें भी सताओगी ।

इश्क वो चिंगारी है जो बुझाने से न बुझे,
जो आग लग चुकी है, उसे कैसे बुझाओगी ।


दास्तान-ए-दिल बहुत लम्बी हो चुकी है,
यूँ ही चुप रहोगी तो कहो कैसे सुनाओगी ।

रोज़-रोज़ का मिलना बन चुका होगा आदत,
अब इस आदत को बोलो कैसे छुड़ाओगी ।

जुड़ तो चुका ही है मेरा नाम तेरे नाम के साथ,
अब इस नाम से खुद को कैसे बचाओगी ।

Friday, February 15, 2008

गज़ल!

दफन हो जायेंगी यादें ज़हन की कब्र में,
इन यादों को कफन तो पहना दो ज़रा ।

कोशिश तो करेंगें यादें जीएँ न दोबारा,
तुम भी हमें कोई तदबीर सुझा दो ज़रा ।

दिल बार-बार सोचता है तुम्हारे लिये क्यों,
तुम्ही इस बात की वज़ह समझा दो ज़रा ।

वीरानीयों ने बार-बार सदा दी बहारों के लिये,
कब तलक आओगे तुम ये बता दो ज़रा ।

गज़ल!

क्यों खेल गये तुम भी मुझसे प्यार का खेल,
क्या ज़रूरत थी हार का एहसास कराने की ।

यूँ ही यकीं करना किसी पर बहुत मुश्किल था,
क्या ज़रूरत थी रहा सहा विश्वास उठाने की ।

जब छोड़ना था हाथ तो थामना ही नहीं था,
क्या ज़रूरत थी किसी को बदहवास बनाने की ।

यूँ भी तो जिंदा हैं हम मुर्दों की मानिंद,
क्या ज़रूरत थी मुझे इक लाश बनाने की ।

ज़मीर तुम्हार कभी तो कचोटता होगा तुम्हे भी,
क्या ज़रूरत है बेवफाई का एहसास कराने की ।

Thursday, February 14, 2008

हम भी वेलेंटाईन मनायें!

आओ प्रिये,
हम भी
वेलेंटाईन मनायें,
प्यार की
परिभाषा दोहराएँ
और
नई आशाएँ,
अभिलाषाएँ जगाएँ
इस
व्यस्त दुनिया की
रोज-रोज की
नई
परेशानियों में
मैं भी
कहीं खो गया था
तुम भी
कहीं खो गईं थीं
शायद
हमारा प्यार भी
सो गया था
आस-पास रहके भी
हम
दूर-दूर हो गये थे
और
अपनी पहचान
खो गये थे
आओ प्रिये
हम
फिर से
नज़दीक हो जायें
एक बार फिर
एक हो जायें
और
अपने सुप्त प्यार को
फिर से जगायें
आओ प्रिये,
हम फिर से
वेलेंटाईन मनायें !

कयों तुम?

क्यों तुम
मुझे
जीने नहीं देती
क्यों तुम
मुझे
मरने नहीं देती

आँख
बंद करूँ तो
सपने तेरे ही तेरे हैं
खुली आँखों को
तेरी यादें घेरे हैं
क्यों तुम
मुझे
चैन से
रहने नहीं देती

हर बात में
तेरी बातें हैं
हर काम से
तेरे नाते हैं
क्यों तुम
मुझे
कुछ करने नहीं देती
क्यों तुम
मुझे
जीने नहीं देती
क्यों तुम
मुझे
मरने नहीं देती


Wednesday, February 13, 2008

मेरी हँसी!

मेरी हँसी, मेरे ग़मों की नकाब है,
उनके ढाए सितमों का जवाब है,
वो सोचते हैं उनकी ज्यादती से मिट जायेंगें हम,
अभी तो करना बाकी उनका हिसाब है ।
*******************************
मेरा हँसना न समझना कि खुशियों का है मिलना,
तू जो न हो, मेरी जिंदगी बनी इक टूटा सपना ।

दर्द दिल ने जो है पाला, उसमें तूने रंग डाला,
कैसे कह दूं मैं बता तू, ग़म ने तेरे मार डाला,
तेरे ग़म में भी मैं खुश हूँ, सारी दुनिया को दिखाना ।

अश्क बहते हैं कहाँ अब, सूनी आँखें हैं कहती सब,
रास्ते भी हैं कहतें अब, वो आयेंगें यहाँ कब,
अब तो राहें भी हैं कहतीं, इक बार फिर से आना ।

Tuesday, February 12, 2008

कोई किसी की होली!

भावना की बारात,
हया की डोली,
बात की बात में,
कोई किसी की होली!

अधरों ने बात कही,
पलकों ने सुनली,
नयनों से नयन,
खेलें आँख-मिचौली!

पी का मनुहार,
आनन्द की चिकौटी,
मैंने थी खुशी से,
यूँ ही आँख भिगोली !

छनक-छनक पायलिया,
नाच उठी यूँ ही,
संगीतमय क्षण की लय,
घंघरूओं ने पिरोली!

बैठी हूँ आँख मूँद,
न पल हों ये चोरी,
अगले जन्म के लिये,
सारी यादें संजोंली !

Monday, February 11, 2008

गज़ल!

क्या ज़रूरत थी दिल लगाने की,
फिर से इक और चोट खाने की ।

सोचते थे कोई तो बावफा मिलेगा,
बेवफाई तो आदत है जमाने की ।

जो वादा करने से ही कतराते हों,
वो जाने क्या वादा निभाने की ।

सुख-दुख जो बाँटना न जानता हो,
ख़ाक हासिल करेगा खुशी जमाने की ।

जो रोता रहता हो खुद ही हरदम,
कैसे कोशिश करें उसे हँसाने की ।

Friday, February 8, 2008

गज़ल!

तुझसे प्यार करने का, मैं गुनहगार हो गया,
मैं तो रुसवा यूँ ही, सरे-बाजार हो गया ।

सभी को भूल बैठा मैं, तुम्हे ही याद करता मैं,
मेरा जीना तो तुझ बिन दुश्वार हो गया ।

तुम्ही से बात मैं करूँ, तुम्हारे साथ मैं रहूँ,
तेरी यादों का मेरा संसार हो गया ।

कभी रास्ता दिखे, तो कभी राह न मिले,
जाने ऐसा क्यों मेरा व्यवहार हो गया ।

कहीं फूल खिल पड़े, कहीं उमंग उमड़ पड़े,
तेरे आने से गुलशन गुलज़ार हो गया ।

Thursday, February 7, 2008

गज़ल!

हैरान हूँ मैं आपसे, क्या थी ख़ता मेरी,
बिन जुर्म के सज़ा मुझे, तुमने अता करी ।

हम तो हजार बार भी मर जायेंगें सनम,
अश्कों से अगर करो , मैय्यत विदा मेरी ।

हर बार हमसे बात तुम करके ख़फा हुए,
आदत में क्या शुमार है, ऐसी अदा तेरी ।

कहाँ से कोई लायेगा, दीवानापन मेरा,
बदली हुई नज़र को भी, समझे वफा तेरी ।

तू लाख मुँह को फेर ले, बेशक नज़र चुरा,
कोई तो आयेगा वो दिन, होगी रज़ा तेरी ।

Wednesday, February 6, 2008

गज़ल!

प्यार है या नफरत, कोई तो रिश्ता है,
तेरे ख्यालों से कोई तो नाता है ।

कोई बात ही न उठती, ग़र बात कुछ न होती,
मेरे जिक्र से कहीं तो वो भी वाबस्ता हैं ।

फूलों की वादियों में, काँटें भी तो मिलेंगें,
बिन काँटों के जहाँ में कोई गुलिस्ताँ है ।

वो दिल कहाँ से लाऊँ, जो हद में बँध के बोले,
हदें बाँधने से निभता कहीं कोई रिश्ता है ।

इन्सान हूँ तभी तो इक भूल हो गई है,
जो भूल न करे, वो तो फरिश्ता है ।

Tuesday, February 5, 2008

गज़ल!

(http://www.shvoong.com/humanities/writing/1759133-making-money-blog/)


क्या ज़रूरत है उनसे दिल लगाने की,
जिन्हे परवाह न हो दिल टूट जाने की ।

करता रहा गुज़ारिश जिनसे आने की,
टालते रहे वो आड़ ले बस बहाने की ।

दिल फिर भी सोचता है उन्ही के लिये,
तदबीर नहीं कोई दिल को मनाने की ।

राह उनकी भी अपनी, राह मेरी भी अपनी,
तकदीर फिर भी वज़ह बनाये मिलाने की ।

जिंदगी गुज़र जाये हँसी-खुशी में बस,
हमने भी सोच ली है उन्हे ना बुलाने की ।

Monday, February 4, 2008

गज़ल!

http://www.shvoong.com/medicine-and-health/1758080-wonders-lemon-grass/
ज़ख्म खाने में तो मज़ा ही नहीं,
तीर जब तक न पार हो जाये ।

दो घड़ी हँस के बात कर ले तो,
क्या कोई दिल का यार हो जाये ।

हम तो एहसान याद रखते हैं,
वर्ना देना उधार हो जाये ।

सह के ग़म तुम हँसाओ दुनिया को,
ख़िज़ा सबकी बहार हो जाये ।

शाम तब तक उदास रहती है,
मिलना न एक बार हो जाये ।

दोस्त माना है तो न छोड़ेंगें,
चाहे दुश्मन हजार हो जायें ।

Saturday, February 2, 2008

तुम्ही बताओ!

मानसपटल पर
अंकित
तस्वीर तेरी
जब तब
धुंधला तो जाती है
पर
कोई शै
इसे
मिटा नहीं पाती है
रोज़-रोज़
हर पल
हर क्षण
इक परत सी
जमने लगती है
इस पर जब
नये वाक्यात की
तो तुरंत
उस परत को
झटक जाती है
याद तेरी
और
फिर से
उभर आती है
तस्वीर तेरी
तो फिर
तुम्ही बताओ
कैसे
मिट पायेगी
मेरे ज़हन से
तस्वीर तेरी!

Friday, February 1, 2008

गज़ल!

क्या फर्क पड़ता है किसी को, आँसू बहाने से,
सबको अपनी ही पड़ी है मतलबी जमाने में ।

अब तो हद कर दी है लोगों ने बेशर्मी की,
दोस्त बनके करते नहीं गुरेज़ छुरी चलाने में ।

सामान सौ बरस का और पल की खबर नहीं,
मशगूल सभी किसी की मौत का सामान जुटाने में ।

दिल पत्थर के और पत्थरों की पूजा करे कोई,
इक उम्र बीत गई है उस पत्थर को मनाने में ।

मिलते हैं सभी यहाँ नकली मुखौटे ओढ़ के,
मुश्किल हुआ है बहुत सही शख्स पहचानने में ।

Thursday, January 31, 2008

गज़ल!

जैसे जैसे उनसे मुलाकात का वक्त करीब आता गया,
दिल पर इक नशा सा छाता गया ।

जो ताने-बाने बुने थे रात भर जाग कर मैंने,
उन सारी बातों को जाने क्यों भुलाता गया ।

ज्यों-ज्यों तुम्हे पाने की शिद्दत बढ़ती गई,
दिल-औ'-दिमाग मेरा साथ छोड़ता गया ।

पल दो पल जो भी गुजारे तुम्हारे साथ,
इक-इक याद का लम्हा दिल पर छाता गया ।

अब तो कदम भी साथ देते नहीं मेरा,
हरेक रास्ता तेरा पता बताता गया ।

Tuesday, January 29, 2008

गज़ल!

हमसे कोई बात करो, कभी तो मुलाकात करो,

ख्वाबों में आओ मेरे, ऐसी तो कोई रात करो ।



टूटे-टूटे से हैं ज़जबात, समाँ बिखरा हुआ,

तुमसे जुड़ जाये ये हयात, ऐसे हालात करो ।



हमने कुछ ऐसा नहीं माँगा, जो तू दे न सके,

संगेदिल बनके न हमको यूँ बरबाद करो ।



सबब कोई तो बनना था मेरी मौत का रब,

तेरे गम में ही मरूँ, ऐसे इंतज़ामात करो ।



हम तो कुछ पूछे बिना हो बैठे तेरे सनम,

अपनी बारी में तो न हमसे सवालात करो ।

Monday, January 28, 2008

गीत

मेरे जीवन में तुम आओ, बस आओ एक बार,
मुझको जीना भी सिखलाओ, सिखलाओ एक बार ।


कोई चाहे दिल से तुमको, तुम जानो न ये बात,
सूनी राहों पर चलना बस चाहे तेरे साथ,
अपना हाथ मुझे पकड़ाओ, पकड़ाओ एक बार ।
मेरे जीवन में तुम आओ,बस आओ एक बार ।


कभी भूल तुम्हे न पाऊँ, इस दिल को कैसे मनाऊँ,
ग़र गीत लिखुँ भी तुम पर, तुम बिन कैसे मैं गाऊँ,
मेरे गीतों को तुम गाओ, बस गाओ एक बार ।
मेरे जीवन में तुम आओ, बस आओ एक बार ।


तेरा अक्स है दिल पर छाया, जैसे हो मेरा साया,
तेरे बिन कुछ न भाया, सब पा के भी है गवाँया,
मझको भी कभी अपनाओ, अपनाओ एक बार ।
मेरे जीवन में तुम आओ, बस आओ एक बार ।


मैने जबसे तुमको है देखा, बदली हाथों की रेखा,
पर जानबूझ कर हमको करते हो तुम अनदेखा,
कभी राहों में मिल जाओ, मिल जाओ एक बार।
मेरे जीवन में तुम आओ, बस आओ एक बार ।


तेरी बातों में है जादू, कैसे रखुँ दिल पे काबू,
मीठे बोलो को सुनाने, कभी पास भी मेरे आ तू,
पतझड़ में लाओ बहार, ले आओ एक बार ।
मेरे जीवन में तुम आओ, बस आओ एक बार ।

गज़ल!

आँख खोलो तो नज़र आओ नहीं,
बंद आँखों से दूर जाओ नहीं ।

कोई शिद्दत से करे प्यार तुम्हे,
इक दफा हम को आजमाओ सही ।

कौन कहता है प्यार धोखा है,
दिल से अपना हमें बनाओ कभी ।

सोच तेरी भी सोच मेरी हो,
हाथ से हाथ तो मिलाओ कभी ।

तुम न चाहो तुम्हारी मर्जी है,
हमको नज़रों से तो न गिराओ कभी ।

Saturday, January 26, 2008

प्रतीक्षण!

अब तो
प्रतीक्षण
ही रहता है
तुम्हारा
प्रती क्षण
और
कटते नहीं कटता
कोई भी क्षण
अब तो
हर पल
हर क्षण
ये ही
कहता है मन
कि
तुम्हारे ही संग
कटे जीवन का
हर क्षण
तुम बिन अब
कहीं भी तो नहीं
लगता है मन
सूना लगे आँगन
और
रीता लगे जीवन
अब तो
हरदम
तेरा ही
अक्स दिखाये
यादों का दर्पण
कभी तो
प्रिये
प्रत्यक्ष आ कर
मेरी बन!


Thursday, January 24, 2008

गीत

आती नहीं, आती नहीं, आती नहीं जान मेरी,
जाती नहीं, जाती नहीं, जाती नहीं याद तेरी ।

ये है बात खास, मेरा मन उदास,
तू आ दिल के पास,
तू दिल से जाती नहीं, जाती नहीं, जाती नहीं ।

मेरा दिल लुटा, मेरा दम घुटा,
ज़रा ये बता,
तू क्यों सताती रही, सताती रही, सताती रही।

Tuesday, January 22, 2008

गज़ल!

करें क्यों याद उनको हम, नहीं जो याद हैं करते,
करें आबाद दिल में क्यों , जो बस बर्बाद हैं करते ।



नहीं मिलती हैं राहें भी, जगे ग़र चाह न दिल में,
नहीं सुनते जो इस दिल की, तो क्यों फरियाद हैं करते ।



भगाना दूर हो ग़म को तो, खुशियाँ बाँटो बस जग में,
मायूस हो सबके जीवन को, नहीं नाशाद हैं करते ।



दिलों में खोट रखके तो, निभा सकते नहीं रिश्ता,
जो रिश्ता ऐसा रखना हो, तो क्यों आगाज़ हैं करते ।



चलेंगें साथ तो खोयेंगें कुछ दोनों ही जीवन में,
जो पाना हो तो खोने का नहीं हिसाब हैं करते ।

Monday, January 21, 2008

न तुमको प्यार न सही!

न तुमको प्यार न सही, न हो एतबार न सही,
ये दिल फिर भी पुकारेगा, न खोलो द्वार न सही ।

समाँ माना तुम्हारा है, नहीं कुछ भी हमारा है,
पर इसका ये सबब तो नहीं, ज़माना ही तुम्हारा है,
ग़ुमाँ इतना नहीं अच्छा, करो न प्यार न सही ।

हमें है कहनी अपनी बात, तुम्हे चाहेंगें हम दिन-रात,
कदम तुमसे मिलायेंगें, चलो न चाहे अपने साथ,
नहीं भूलेंगें तुमको हम, करो न प्यार न सही।

Friday, January 18, 2008

गज़ल!

कभी हमें भी याद कर लो तो बुरा क्या है,
सुकुँ हमें भी मिले तो बुरा क्या है ।

हमारे ख्यालों में तो आठों पहर रहते ही हो,
हमें भी ख्यालों में लाओ तो बुरा क्या है ।

वैसे तो रास्ते तुम्हारे भी ज़ुदा अपने भी ज़ुदा,
कभी कदम से कदम मिलाओ तो बुरा क्या है ।

गुलशन में फूल खिलाने से कांटे तो चुभें गें ही,
फिर एक-आध ज़ख्म खाने में बुरा क्या है ।

हकीकत लाख छुपाने से क्या छुपा सकोगी,
फिर हमको सच बताने में बताओ बुरा क्या है ।

Thursday, January 17, 2008

मेरी नाँव बनो!

तुम खड़ी हो क्यों उस पार प्रिये,
मैं बीच खड़ा मँझधार प्रिये !

जीवन का सागर गहरा है,
घुटनों तक पानी ठहरा है,
इक कदम भी चलना मुशिकल है,
मेरी नाँव बनो इक बार प्रिये!

मन जो कहने से डरता,
वो ही बातें क्यों करता,
क्यों सोच में डूबे बैठे हो,
इक बार करो इकरार प्रिये!

Wednesday, January 16, 2008

ग़र तुम मेरे होते!

ग़र तुम मेरे होते, तो हम न यूँ फिर रोते,
दिन कटते मस्ती में, रात को चैन से सोते ।

तारों की तुम बात करो न, तारों का साथी चंदा,
अपना कोई साथी होता तो तारे तो न गिनते ।

कहीं फूल खिलें गुलशन में, कहीं राह मिले कांटों की,
तुम जो हमको मिलते ,छाले पैरों में न होते ।

जब भोर की किरणें आईं, खोली आँखें अलसाई,
जो ख्वाबों में तुम आते, फिर से हम सो जाते ।

गर्दिश में जब हों तारे, तो छोड़ के भागे सारे,
जीवन आसाँ हो जाता, ग़र तुम लौट के आते ।

Monday, January 14, 2008

गज़ल!

कोई कह देता है मन की, कोई चुप रहके सहे,
इक-दूज़े से सुलटना तो रिश्तों का व्यापार है ।

कोई किसी की खुशियों में मर जाता है खुशी से,
और कोई होता है खुश किसी को यूँ ही मार के ।

कट रही है जिंदगी अब भी उनके इन्तज़ार में,
पा लिये हैं क्यों ये ग़म हमने उनके प्यार में ।

सोचता था मैं कभी उनसे नहीं टकराऊँगा,
फिर हो गई मुलाकात लेकिन आज बीच बाजार में ।

ढ़ाई अक्षर दर्द के और ढ़ाई अक्षर प्रेम के,
इसलिये दोनों में रिश्ता बन गया संसार में ।

Wednesday, December 19, 2007

मनोबल!

नर्म बर्फ की
चादर ने
ढाँपने चाहे
मेरी
यादों के साये
सर्द हवाएँ भी
मेरे मन-मस्तिष्क को
सुन्न कर देने की
कोशिश में
साथ देती रही उसका!
ये यादें पर
उभर आती हैं
फिर से
बर्फ से ढके
पड़ों की
पत्तियों सी!
मैं जानता हूँ
ये बर्फ की चादर
ये सर्द हवाएँ
अक्षम हैं
मेरे मन का
मनोबल ही
सक्षम है
इसलिये इनसे
कोई हार क्यों माने!
ये भी तो जानें
हम हैं
उनके ही दीवाने!!
(अमेरिकावास के दौरान रचित)

Wednesday, November 7, 2007

कोई वादा नहीं!

कोई वादा नहीं
कोई नाता नहीं
फिर भी दिल को मेरे
चैन आता नहीं
चल दिये थे वो क्यों
हमसे नज़रें मिला
बेरूखी का सबब
जान पाता नहीं

तुम न चाहो
तो शिकवा नहीं है हमें
मेरी चाहत को लेकिन
नहीं रोकना
रुबरु न कभी
तेरे ख्यालों से हों
ऐसा लम्हा
मेरे दिल को भाता नहीं

बात छोटी भी है
बात है भी बड़ी
हमको चाहत की
मिलती नहीं क्यों घड़ी
दोष किस्मत को दें
या ज़माने को दें
कोई साथी
हमें समझ पाता नहीं

ग़जल!

कोई उम्र नहीं होती है प्यार करने की,
कौन जाने, कौन सी घड़ी हो मरने की ।

रिश्तों की ख़ातिर कोई तो मर मिटे उन पर,
और कोई करे ना परवाह किसी के मरने की ।

ऐसा कहाँ लिखा है कि प्यार एक ही करना,
हद होती नहीं है कोई तो प्यार करने की ।

मस्ती भरी है दुनिया, मस्ती भरा हर पल,
बस आँख होनी चाहिये पहचान करने की ।

दो लम्हे ग़र बाँटना चाहे कोई उनसे,
ज़रूरत क्या पड़ी दुनिया को ऐतराज़ करने की

Tuesday, November 6, 2007

ग़जल!

कोई दर्द दे गया तो कोई प्यार दे गया,
बस यादों का मुझको उपहार दे गया ।

कभी दिल संभल गया, कोई तोड़ दिल गया,
हर बार दिल का लेकिन ऐतबार ले गया ।

कभी बात हो गई तो कभी मौन रह गये,
हर बार चैन कोई दिलदार ले गया ।

कभी पूछते थे हमसे खुशियों का जो पता,
वो राहों में मेरी क्यों ख़ार दे गया ।

हर बार ज़िंदगी से ये पूछना पड़ा,
क्यों हादसों का मुझको संसार दे दिया ।

Sunday, November 4, 2007

गज़ल!

कभी तो याद कर लिया करो,
हमसे दो बात कर लिया करो ।

ज़ुदा नहीं हैं हम ज़माने से,
कभी तो मुलाकात कर लिया करो ।

ख़ुद में घुट के रहना ठीक नहीं,
इज़हार अपने ज़जबात कर लिया करो ।

ज़िंदगी के सूखे रेगिस्तान में,
प्यार की बरसात कर लिया करो ।

ख्वाबों में रूबरू हो सकुँ तुमसे,
हर दिन को रात कर लिया करो ।

Saturday, November 3, 2007

अपने-पराये !

जो अपने न थे, उन्हे अपना बनाने की कोशिश में,
अपनों से दूर हो गये हम ।
इस भीड़ भरी दुनिया में, अकेले रहने को,
मज़बूर हो गये हम ।

कहीं तो किसी बात का किसी को एहसास होता,
जिसका कोई नहीं, कोई तो उसके पास होता,
हर तरफ मची धोखों की धूम में,
किसी पर तो हमें विश्वास होता,
यूं ही चलते-चलते म्रगत्रष्णा में,
खो गये हम ।

बनाते रहे तमाशा अपनी वफाई का,
बाजार पर गर्म है अब बेवफाई का,
बस काम से ही मतलब सबको ज़माने में,
डर नहीं किसी को तेरी खुदाई का,
अब तो अपनों की दुनिया में ही,
बेगाने हो गये हम ।

Friday, November 2, 2007

गीत

दर्दमन्दों से कहाँ पूछें ये दुनिया वाले,
कैसे सहलाएँ बता दिल के रिसते छाले ।

कौन आता है यहाँ देखने वीरानों को,
भाव देता है कहाँ कोई दीवानों को,
चाहे वो जाँ हंसते हुए ही दे डालें ।
कैसे सहलाएँ बता दिल के…

बस वही जीता है जिसने बुनी अपनी दुनिया,
दिल के हाथों जो बिके, उसको कहें सब रसिया,
यहाँ मिलते नहीं साथ में चलने वाले ।
कैसे सहलाएँ बता दिल के…

गज़ल!

हर बार सोचता हूँ, नहीं दिल लगाना है,
ग़म पालने का लेकिन, ये तो बहाना है ।

वो हँसते हैं,कहते हैं, दिल फेंकते हो क्यों,
वो जानते कहाँ हैं, उनको आजमाना है ।

सोई हुई तकदीर है, गर्दिश में हैं तारे,
इक चाँद मेरा हो तो, अपना ये जमाना है ।

वैसे तो नहीं आती, दिल में कोई भी सोच,
लिखते हैं इसी ख़ातिर, उनको जो सुनाना है ।

वो सोचते हैं उनको बताते हैं दिल का हाल,
अपनी गज़लों में तो, सब का ही फसाना है ।

Thursday, November 1, 2007

गज़ल!

इतने भी संगदिल न बनो कि पत्थर भी शरमाने लगें,
और जहाँ वाले दिल लगाने से कतराने लगें ।

ये माना कि हंसी हो तो गुमां भी होगा ही तुम्हे,
पर ये तो अच्छा नहीं कि कोई सभी को ठुकराने लगे ।

और भी तो हंसीं होंगें ही दुनिया में तुम जैसे कई,
यूँ तो नहीं कि सभी पर दिल किसी का आने लगे ।

तुम भी तो रोये ही होगे कभी किसी की ख़ातिर,
फिर ऐसा क्यों है कि हमको तुम रूलाने लगे ।

ज़िंदगी तो गुजर ही जायेगी रफ्ता-रफ्ता करके मेरी,
वो अलग बात है, हर मोड़ पे तुम नजर आने लगे ।

गज़ल!

जितना दर्द दिया तूने है, उतने दर्द भरे मेरे गीत,
ये कैसा रिश्ता तुमसे बना, बने हो दर्द के मेरे मीत ।

ज़ख्म हो छोटा या हो बड़ा, दर्द तो हमको देगा ही,
फिर भी दुनिया में क्यों है, ज़ख्म कुरेदने की रीत ।

ना जाने आता मज़ा क्या, दिल से किसी के खेल कर,
और मज़े की बात है इसको नाम भी देते हैं प्रीत ।

ये तो बात है किस्मत की, कोई हंसता है कोई रोता है,
कहीं बजती शहनाईयाँ, कहीं बजते हैं मातम के गीत ।

छोटी सी मुलाकात में तुम भी थोड़ा दर्द तो ले ही गये,
इस दर्द के रिश्ते में बोलो कैसी हार और कैसी जीत ।

Wednesday, October 31, 2007

गज़ल!

जहाँ से रूखसती के वक्त जो तेरा प्यार याद आये,
कसम तेरी, मुझे दोनों जहाँ इक साथ मिल जायें ।

तुम्हारी जुस्तजू में काट लें गें जिंदगी सारी,
नज़र जो प्यार की तेरी हमें इक बार मिल जाये ।

उन्हे पाया भी न था और हमने खो दिया उनको,
कोई तदबीर करो ऐसी वो हमको फिर से मिल जायें ।

जो दर्द हमने माँगा था ख़ुशी से दे दिया तुमने,
जरा सी और नेमत हो तो हमको मौत मिल जाये

समझ न पाये हैं हम जिंदगी के मायने अब तक,
अगर कोई बता पाये तो मंजिल हमको मिल जाये ।

गज़ल!

अब तो कोई ग़म तकलीफ देता नहीं,
आदत जो पड़ गई है तेरे ग़मों की ।

बात और कोई सुनाई देती नहीं है,
आदत सी पड़ गई है तेरे लफ्ज़ों की ।

खूँ के कतरों से दास्ताने-दग़ा लिखना,
बन गई है आदत अब मेरी रगों की ।

तुम भी, हम भी और दुनिया भी वही,
बस पहचान ही बदल गई नज़रों की ।

हर बात में मतलब अपना ही देखना,
परिभाषा ही बदल दी गई अर्थों की ।

Tuesday, October 30, 2007

आरम्भ!

जब सावन की रिमझिम
बुला रही है तुम्हे
तो क्यों
रेगिस्तान की तप्ती रेत पर
चलना चाहती हो
जीवन की म्रगत्रषणा
धरती-आसमान के
मिलन की तरह है
जो आपस में
मिलते हुए भी
कभी मिल पाते नहीं हैं
इसलिये जो अपना है
उसे किसी अनदेखे की चाह में
मत ठुकराओ
क्या पता ये तुम्हे
वो न दे
जो तुम्हे कभी मिल जाये
या तुम्हे वो मिल जाये
जो फिर कभी न मिले
यही तो प्रारब्ध है
यही आनन्द है
जहाँ से चलना आ जाये
समझो वहीं से
आरम्भ है !

तेरी याद जगाती है!

जब भी नींद मेरे पास आती है
तेरी याद चुपके से
पहलू में आकर बैठ जाती है
और मुझे रह रह कर जगा जाती है
और कहती जाती है
उठो, मुझसे दो बातें करो
वो भी तो रात को
खुद को अकेला पाती है
मैं कहता हूँ
नींद न खराब करो मेरी
सपनों में उनसे मिलना है
जिनमें वो कम से कम
हमसे दो बातें तो कर जाती है
तो याद तेरी
रूठ जाने की धमकी दे जाती है
और मुझे डरा जाती है
मैं डर कर तेरी यादों से
बातें करने में लग जाता हूँ
सोचता हूँ
सपने कब तक साथ देंगें मेरा
ये तो अंधेरों के साथी हैं
आँख खुलने पर
उनका मिथ्या जाल टूट जाता है
बस तेरी याद ही तो
मेरा साथ निभाती है
दिन हो या रात हो, कोई भी बात हो
चुपके से आकर
ये मेरे पहलू में बैठ जाती है
बस यही तो है
जो मुझे हंसाती है, रूलाती है
और साये की तरह
हर जगह साथ आती है
साथ आती है, साथ आती है, साथ आती है!

Sunday, October 28, 2007

गज़ल!



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इन झील सी गहरी आँखों में उतर तो जाऊँ,
डरता हूँ कहीं किनारा मिले न मिले ।

दो शब्द प्यार के तो कह देती हमें,
जाने फिर दोबारा हम मिलें न मिलें ।

बढ़ के थाम लेते ये बढ़े हुए हाथ,
फिर कभी कोई सहारा मिले न मिले ।

जिंदगी को प्रीत भरी निगाह से देख लो,
फिर कभी ये नज़ारा मिले न मिले ।

ख़ुदा की नेमत मान कबूल कर सब,
दोबारा उसका इशारा मिले न मिले ।

Saturday, October 27, 2007

गज़ल!

हमने तो दिल किताब की तरह खोल के रख दिया,
अब ये उन पर मुनहसर है कि वो उसे पढ़ें न पढ़ें ।

ये दिल तो गाता है अब उन्ही के प्यार के गीत,
अब ये उन पर मुनहसर है कि वो सुनें न सुनें ।

कुछ तो आता होगा उनके दिल में भी हमारे लिये,
अब ये उन पर मुनहसर है कि वो कहें न कहें ।

दिल हमने रखा है खाली सजा के उनके लिये,
अब ये उन पर मुनहसर है कि वो रहें न रहें ।

हमें तो हर लम्हा हर पल अब दिखते हैं वो,
अब ये उन पर मुनहसर है भरोसा करें न करें।



Friday, October 26, 2007

गज़ल!

हमें तो उनके ग़म में ही जीने का आने लगा मज़ा,
या ख़ुदा, इसे तेरी नेमत कहुँ या मानुँ इसको मैं सज़ा ।

उम्मीद के दामन को पकड़े रास्ता हैं देखते,
कौन जाने फिर कभी गुलशन में आ जाये फिज़ा।

हर हाल में मुस्करा के जीने की चाहत है अब,
क्या पता खुशियाँ भी साथ में ले आयें कज़ा ।

धूल, काँटे, पत्थरों के साथ की आदत तो थी,
ऐसे में कोई बताये क्या करेगी ये ख़िजा ।

चोट खा के भी लगाने मरहम हम थे चल दिये,
वो ही ज़ख्म दे दे तो होगी इसमें तेरी ही रज़ा ।

गज़ल!

हमें तो ख़ारों में रहने की आदत सी पड़ चुकी है,
एक नश्तर तुम भी चुभा जाओगे तो क्या होगा!

ये बहारें भी तो तड़पाती हैं हमें जी भर के,
खिज़ां भी अगर आ जायेगी तो क्या होगा!

तुम्हारी सोंधी सी खुशबु बसी रहती है ज़हन में,
तुम अगर नहीं भी आओगे तो क्या होगा!

बसी रहती हो आठों पहर ख्यालों में मेरे,
नींद अगर नहीं भी आयेगी तो क्या होगा!

हम तो हमेशा के लिये तुम्हारे हैं हुए,
तुम अगर नहीं भी अपनाओगे तो क्या होगा!

अदा वाह है!

किसी की नींद उड़ा कर कहते हो मेरा कसूर क्या है,
आपकी दिल चुराने की अदा भी बहुत वाह है।

आपको अच्छा न लगता हो बेशक हमारे साथ चलना,
हमारा दिल रखने को कुछ दूर साथ देने में हर्ज क्या है।

अपनों की खातिर जो हो गये हों अपनों में ही बेगाने,
उनसे कोई रिश्ता रखने में डरने की ज़रूरत क्या है।

सुनते हैं दुआ करने पर पत्थर भी पिघल जाते हैं,
आपका दिल बता दो हमें, बना किस चीज़ का है।

और आसमान से शोले बरसते हों या बरसे फुहार,
धरा को लेकिन खुद पर ये बोझ लगते कहाँ हैं।

Thursday, October 25, 2007

मुलाकात का पल!

ग़र तुमसे
मुलाकात का एक पल
इक युग हो जाता
तो मेरा प्रेम
अमर हो जाता!

सोचता हूँ
मेरे पास ही तो थी
तुम अभी-अभी
ग़र तुम्हारे साये को
छू पाता
तो तुम्हे
अपनी आत्मा में
आत्मसात कर पाता!

जिंदगी में
मोड़ तो आयेंगें टेढ़े-मेढ़े
रास्ते जुदा भी होंगें
अक्सर तेरे-मेरे
मैं बेफिक्र हो
जीवन का संघर्ष कर पाता
ग़र जुदा रस्तों को
किसी मोड़ पर मिला पाता!

Wednesday, October 24, 2007

गज़ल!

दो अश्क करो जो मेरी मय्यत के नाम,
कर देंगें अपनी सारी दुनिया ये तेरी।

साथ आओ न आओ हमारे कभी तुम,
साये से ही कर लेंगें बातें हम तेरी।

गोते जब खायेंगें जिंदगी के भँवर में,
बन जायेंगी सहारा बस यादें ही तेरी ।

छूट जाये जो साथ मजबूरी में तेरा,
काम कुछ तो करेगी तस्वीर ये तेरी।

कौन चाहेगा कि चाहने वाला न मिले,
बस ज़रूरत हमें है इक हाँ की तेरी

आओ दर्द बाँट लें!

दर्द तेरे दिल में भी, दर्द मेरे दिल में भी,
दर्द इक-दूसरे का आओ बाँट लें।
राहें मुश्किल बहुत, बताये कैसे कोई,
आओ कुछ दूर तक सफर साथ काट लें।

सोचना हमको है क्या, सोचना तुमको है क्या,
है मंजिल वही, रोकना मन को है क्या,
आओ सबसे अलग आशियाँ छाँट लें ।

टूटते रहते दिल हैं जहाँ में बहुत,
ऐसा हमने नहीं होते देखा कभी,
सारी दुनिया से कोई खुद को काट ले ।

Tuesday, October 23, 2007

गज़ल!

दर्द जब तक हमें मिलता नहीं,
ज़ख्म गहरा कोई सिलता नहीं।

मार ठोकर हमें चल दिये थे वो,
दिल फिर भी शिकवा करता नहीं।

नाव कैसे उतरेगी पार बता,
पानी में ग़र कोई उतरता नहीं।

बादल गरजते तो देखे हैं बहुत,
हरदम ही तो वो बरसता नहीं ।

शाम ढ़लने से पहले तू दिल न हार,
सूरज वक्त से पहले तो ढ़लता नहीं।

Monday, October 22, 2007

खत्त्म बात हुई!

दो पल की मुलाकात में खत्म बात हो गई,
दिन चढ़ने से पहले ही घनी रात हो गई ।

उम्मीद तो न थी वो मुँह मोड़ कर चल दें गें,
जिसकी उम्मीद न थी हमें, वही बात हो गई ।

गुल खिलेगा तो ख़ारों का संग तो लाज्मी है,
अब तो ख़ारों की मानिंद अपनी हयात हो गई ।

बादलों की भीड़ में कभी-कभी चमक उठें बिजलियाँ,
बीता सपना अब मौसम की बरसात हो गई ।

दो अश्क टपक जाते हैं आँखों से रह-रह कर,
होठों की हंसी तो अब गई बात हो गई ।

चाहे रहो चुपचाप!

तुम रहो चाहे चुपचाप
हम समझ जायेंगें आप
कि तेरा दिल सब बोले
कहे पर हौले से

जीवन की काली रात
अब बनी सुबह की भांत
दिन कट जायेंगें आप
जो रहो हमारे साथ
कि मेरा दिल यही बोले
कहे पर हौले से

ग़र करना चाहो प्यार
नहीं करती क्यों इकरार
क्यों लगता है दुश्वार
बस हाँ करना इकबार
नयन सब कुछ बोलें
कहें पर हौले से

भटकन!

क्यों चाहत की गलियों में चले गये,
सीधे-साधे रास्तों से भी भटक गये ।

जो लफ्ज़ मुँह से न कह पाये थे हम,
कैसे खुद-ब-खुद उन तक पहुँच गये ।

दिल लगाना तो ताउम्र मंजूर न था,
उसी दिल के हाथों कैसे भटक गये ।

कोई पहचान तो न थी उनसे मगर,
भरी भीड़ में वो ही क्यों टकर गये ।

दर्द से कोई वास्ता न था अब तक कोई,
खामखाह क्यों काँटों से हम उलझ गये ।

Sunday, October 21, 2007

दो पल!

अपनी मसरूफतियों में से
दो पल हमें भी दे दोगे
तो तुम्हारा क्या जायेगा?
किसी मासूम का दिल
तो संभल जायेगा!
यूँ तो दुनिया में
बहुत कुछ है
दिल लगाने को
दिल से दिल लगाओगे
तो कुछ और ही
नशा आयेगा!
हम जैसे
तुम्हारे दीवाने को
कुछ और नहीं चाहिये
दो पल बात कर लोगे
तो जीवन
थोड़ा तो संवर जायेगा!
कब तक
भागते रहोगे दूर
दुनिया की
अनकही खुशियों से
और काटते रहोगे वक्त
करके मरहूम खुद को
हंसीं वादियों से
दो पल बैठोगे हमारे साथ
तो खुद ही
जीवन का सबब
समझ आ जायेगा!

Saturday, October 20, 2007

तू कैसी होगी?

अक्स तेरा
मदमस्त बड़ा
तो तू कैसी होगी
ये बता!

मुलाकात करो
तो बात बने
कुछ जीने की
सौगात बने
मुलाकात की क्या
तदबीर करें
हमसे आके
कभी तो बता!

हर रात
यूँ ही कट जाती है
अँखियों में
नींद न आती है
ख्वाबों में
तुझसे कैसे मिलें
ख्वाबों में आके
तू ये बता!

ऐसा तो कभी हुआ न था!

ऐसा तो कभी हुआ न था कि रातों की नींद उड़ गई हो हमारी,
ज़रूर वो हमारी याद में करवटें बदलती होगी !

ऐसा तो कभी हुआ न था कि बहारें हमसे गुफत्गु न करें,
ज़रूर बहारें तेरी ज़ुल्फों के साये में मचलती होंगी!

ऐसा तो कभी हुआ न था कि बादल यूँही बेसाख्ता बरसने लगें,
ज़रूर घटाएँ तुझ बिन आँसू बहाती होंगी !

ऐसा तो कभी हुआ न था कि सूरज अपनी गर्मी भूल जाता हो,
ज़रूर तुम अपना चेहरा उसको दिखलाती होगी!

ऐसा तो कभी हुआ न था कि वक्त भी चलते-चलते थम जाये,
ज़रूर देखली उसने तेरी चाल मदमाती होगी!

Friday, October 19, 2007

नहीं सह पायेंगें!

अब न तो कुछ सुन पायेंगें, न ही कुछ कह पायेंगें,
पर मालुम नहीं, तुम बिन रह पायेंगें या नहीं रह पायेंगें ।

सब से हंसीं था वो पल जो तेरे साथ था गुजरा,
उस पल की याद न मालुम सह पायेंगें या नहीं सह पायेंगें ।

इस भीड़ भरी दुनिया में तेरा ही साथ तो भाया था,
तुझ बिन अकेले न मालुम रह पायेंगें या नहीं रह पायेंगे।

कोई ज़ख्म पे ज़ख्म दिये जाये, कोई ज़ख्म ही लिये जाये,
इस दिल पर इक और चोट सह पायेंगे या नहीं सह पायेंगें।

इक जमाना गुजर गया हँसी से रूबरू हुए हमें,
सांस रहते कोई खुशी हम ले पायेंगें या नहीं ले पायेंगें।

Thursday, October 18, 2007

दोस्ती !

अब ग़म से दोस्ती हो ही गई,
अब ग़म से प्यार ही करना है!

अब ग़म ही मेरा दीदावर,
अब ग़म ही मेरा हमसफर,
अब ग़म से पानी हैं खुशियाँ,
अब ग़म से पाना है सब्र,
अब ग़म से क्यों कर गुरेज़ करूँ,
अब ग़म से प्यार ही करना है!

अब ग़म ही तेरा तोहफा है,
अब ग़म के संग ही सोना है,
अब ग़म ही मेरा बिछौना है,
अब ग़म के संग ही हँसना है,
अब ग़म के संग ही रोना है,
अब ग़म से प्यार ही करना है!

अब ग़म का तेरे शुक्रिया,
अब ग़म ने तुझको दे दिया,
अब ग़म में मैं हूँ खो गया,
अब ग़म में तेरा हो गया,
अब ग़म ही खुशियाँ हो गया,
अब ग़म से प्यार ही करना है!

Wednesday, October 17, 2007

अदा!

आप में जो दिल चुराने कि अदा है,
उसी पर तो ज़माना फिदा है!

सामान कर गये वो ही मेरी मौत का,
ज़िंदगी को जिसके नाम लिखा है!

यही तो मिला अपनी दुआओं का सिला,
बहारें उनके नाम, अपने नाम खिज़ा है!

चुनींदा-चुनींदा ज़ख्म दे रहें हैं वो,
इसीलिये तो वो ज़माने से ज़ुदा हैं!

हमारी बात शायद कभी समझ पायें वो,
तभी तो हमने इस गज़ल को कहा है !

Tuesday, October 9, 2007

गज़ल!

ऐसा तो नहीं कि तुम बिन जी नहीं पायेंगें,
पर दर्द दिल का हम सह नहीं पायेंगें ।

बात तो आयेगी होठों पर कई बार तेरी,
पर मन की किसी को भी कह नहीं पायेंगें ।

नींद तो रह-रह के सताती है सपनों की खातिर,
पर तुम बिन चैन से सो नहीं पायेंगें ।

यूँ ही जीना है तो घुट-घुट के जी लें गें हम,
तेरी याद में दुनिया के सामने रो नहीं पायेंगें।

Monday, October 8, 2007

गज़ल!

भूले से कहीं पर जब मुझको तस्वीर तुम्हारी दिख जाये,
मैं सब कुछ भूल के जीवन में बस गीत तुम्हारे गाता हूँ ।

इस भीड़ भरी दुनिया में जब तन्हाई डसने लगती है,
मैं तब-तब अपने ख्यालों में तुमको ही पास बुलाता हूँ ।

जब रात के अँधियारों में चंदा और तारे जगते हैं,
मैं भी संग-संग उनके तेरी यादों के दिए जलाता हूँ ।

सब से पहले बस नाम तेरा मेरे होठों पर आता है,
मैं जब-जब कविता लिखने को कागज़ औ' कलम उठाता हूँ ।

सब कहती तेरी अंगड़ाई!

बंद करती हो जब ये कमलनयन,
ऐसा लगता है ज्यों प्रियतम से,
कुछ कहते हुए हो सकुचाई !


रंग चेहरे पे आता-जाता है,
जो चाहो, कह नहीं पाती हो,
तुम दूर बैठी हो घबराई!


माना रोके तुम्हे तुम्हारी हया,
तुम लब अपने चाहे खोलो न,
सब कह जाती तेरी अंगड़ाई!

यूँ घूँघट न बनाओ पलकों को,
खुद कहती सारी कहानी तेरी,
भरी नींद से, आँखें अलसाईं!

तुम न जानो तो मैं बताता हूँ,
प्यार तब-तब हिलोरे लेता है,
जब-जब आँखें तेरी शर्माईँ!

Sunday, October 7, 2007

गज़ल!

आदत सी पड़ गई है दोस्तों की दगा की,
बेवफाओं से करते गुरेज़ नहीं है पर ।

अपना बना के लूटा मेरा आशियाँ सभी ने,
नये आशियें से हमको परहेज़ नहीं है पर ।

वो दोस्त हैं हमारे, इतना तो यकीं है,
प्यार का वो लेते मर्ज़ नहीं हैं पर ।

मतलब भरी दुनिया में लेते तो सभी हैं,
उतारना कोई चाहता कर्ज़ नहीं है पर ।

दिल अब नहीं है करता दुनिया में जीने को,
तुम्हे देख लें तो जीने में हर्ज़ नहीं है पर ।

Thursday, October 4, 2007

तुम क्या हो!

क्यों उपमा दूँ चँदा की तुम्हे,
चँदा तो है सारे जग का !
कैसे कह दूँ गुल भी तुमको,
एहसास हो काँटों के संग का!
उगते सूरज की लाली से भी,
कैसे तुलना तेरी मैं करूँ?
तुम खुद में ही इक सूरज हो,
ज्योतिपुंज हो मेरे मन का!
चंचल हिरणी की चंचलता,
भी जैसे तेरी सानी नहीं,
तुम कोमलता से कोमल हो,
कैसे वर्णन हो नख-शिख का!
कुछ भी कह ले कोई तुमको,
कैसी ही कोई उपमा दे,
सबसे पहले तुम मेरी हो,
तुम प्राण हो मेरे जीवन का!

Wednesday, October 3, 2007

विरहन की पुकार!

पंछी सारे जा रहे अपने-अपने नीड़ को,
तुम क्यों आये नहीं मिलने अपनी हीर को?

सुबह निकली, शाम का है अब अंधेरा छा रहा,
दीप जलने हैं लगे, पर मन मेरा धुंधला रहा,
तुम बिन कैसे बहलाऊँ बिरही मन अधीर को?

राह ढूँढे, गलियों का हर मोड़ तुम्हे बुला रहा,
खो गये तुम जाने कहाँ, हर लम्हा है सता रहा,
हे खुदा! सवारूँ कैसे बिगड़ी इस तकदीर को?

Monday, October 1, 2007

कैसे दिल को चुराते हो!

तरेर कर यूँ आँखें, क्यों इतना इतराते हो,
दिल दे रहे हो हमको, क्या ये जतलाते हो ।


खुद चुपके-चुपके, मुझसे मेरा चैन चुरा ले गये,
जब हमने कुछ मांगा तो सबको बतलाते हो ।

हूँ नासमझ, ये माना, न जानूँ कोई दाँव,
कुछ हमको भी समझाओ, कैसे दिल को चुराते हो।

दस्तूर यही पाया है कि ना भी हाँ बन जाये,
बस नाहक तड़पाने को, तुम बात बनाते हो ।

नहीं माँगता मैं जाओ तुमसे कोई भी चीज़,
पर देखना है कब तक तुम दिल को बचाते हो ।

जीवन बनवास हुआ जाता है!

आज फिर मन मेरा उदास हुआ जाता है !

सब कुछ ठहर गया, दिल के दायरों में,
मन मेरा तरस गया, बरखा-बहारों में,
बदरंग हर इक उल्लास हुआ जाता है!

चुभन काँटों सी, मिलती है फूलों से,
सारी राहें, पटी मिलती हैं धूलों से,
तुम बिन जीवन बनवास हुआ जाता है!

पंछी बन के पिया, उड़ना चाहूँ मैं,
बंधन तोड़ सभी, मिलना चाहूँ मैं,
तेरे लिये, मन मेरा बिंदास हुआ जाता है!

Friday, September 28, 2007

मेरा मन इस आस जले!

ऐसे ही थे फूल खिले, जब तुम गये वसंत मिले!
भाने लगा था हर एक रंग, पाके तेरा प्यारा संग,
अब के बरस बोलो क्या करूँ, उठती नहीं कोई भी उमंग,
क्यों ले मन के सारे रंग, दे के भगवा रंग चले!
दीप जलाऊँ जितने भी, रहे अँधेरा इस आँगन,
अब तो लगता है शायद, यूँ ही बीतेगा जीवन,
तुम आ जाओ जाने कब, इस आस ये मन का दीप जले!
सूना घर, सूना आँगन, सूने हैं अँखियों के सपने,
गैरों को क्या गैर कहें, अब तो गैर हुए अपने,
ग़र छोड़ के यूँ ही जाना था,मन को क्यों थे लगे भले?

Friday, September 21, 2007

गज़ल!

बात किससे करें, हर शख्स है गमगीं यहाँ,
ओढ़े फिरते हँसी, चेहरों पर नकली यहाँ ।


दिल गुनहगार है, खुशियों का तकाज़ा करके,
किसको मालूम था, खुशियाँ भी हैं बिकती यहाँ ।


कैसे कह दें कहो, मयखाने को ग़म का साथी,
ग़मों का ये ज़ोर है, मय भी नहीं चढ़ती यहाँ ।


हम हैं नाचीज़, कब हों फनाँ क्या मालूम,
याद रह जायें गें, गज़लें नहीं मरती यहाँ ।

Monday, September 17, 2007

तेरा शुक्रिया!

सुप्त थी भावना,
जगा दिया -
जादू किया !


ओढ़ के चादर मस्त अंधेरों की,
मग्न था, न थी खबर सवेरों की,
आस का इक दिया जला दिया -
खूब किया,
जादू किया !


बिना पतवार और मांझी के मैं,
उतरता-डूबता था थपेड़ों में मैं,
किनारे नैया को लगा दिया -
दे के जिया,
जादू किया !


मंजिलें थीं मगर हम भटकते थे,
सीधे से रास्ते भी न मिलते थे,
रास्ता इक नया दिखा दिया -
तेरा शुक्रिया,
जादू किया !

Saturday, September 15, 2007

गज़ल!

मैं भूला नहीं हूँ तुम्हारी दगा,
मुझसे फिर भी न होगी तुमसे ज़फा ।

तुम बहारों को अपना बनाते रहे,
हम ख़िजां से हमेशा रहे बावफा ।

बात करने से हमको नहीं है मना,
पहले जैसी दिल में जगह है कहाँ ।

मेरे पहलू में दिल है तुम्हारी तरह,
सोच करके कभी तुमने देखा कहाँ ।

आदतन तुमसे कर बैठे शिकवा-गिला,
तुम पर उसका असर लेकिन होगा कहाँ ।

गज़ल!

कौन जिये मरने की ख़ातिर,
जीना-मरना , अब बराबर हैं ।

बहुत हुईं उनसे उम्मीदें,
चाहत-नफरत, अब बराबर हैं ।

दिल ही अपना, काफिर निकला,
वफा-दग़ा, अब बराबर हैं ।

हो न असर, किसी बात का उन पर,
हँसना-रोना, अब बराबर हैं ।

बहुत निभा ली उनसे मुहब्बत,
मिलना-बिछुड़ना, अब बराबर है ।

मैं अकेला !

मैं अकेला, राह अकेली,
संग मेरे, यादें हैं अकेली ।

कमरे में उतर आए,
ख़ामोश घुप साए,
मुझको बुलाएँ,
आजा बने हम,
एक हमजोली,
मैं अकेला, राह अकेली ।

मेरे साथ चलें,
पथ पथरीले,
पर न सताएँ,
पाँव के छाले,
लगें कोमल सी कली,
मैं अकेला, राह अकेली ।

आये थे वो भी,
बन कर छलावा,
भुलाये न भूले,
उनका छलावा,
यादें लगें भलीं,
मैं अकेला, राह अकेली ।

गज़ल!

मुझसे ज़रूर उनका कोई वास्ता तो था,
वरना वो देख कर चुराते नज़र नहीँ ।

कोई हादसा इस उम्र में होना ज़रूर था,
वरना वो फेर कर मिलाते नज़र नहीँ ।

लगता है रास्तों को भी हो चुकी ख़बर,
वरना कभी वो राह में आते नजर नहीं ।

जो लूटनी न होती मेरी जाँ औ' हयात,
नज़रों से दिल वो अपना करते नज़र नहीं ।

था सोचता कि दुनिया में नहीं हैं बेईमान,
तुमसे हसीन चोर तो आते नज़र नहीं ।

Thursday, September 13, 2007

गज़ल!

हर गली के मोड़ पर इक बेवफा मिला,
हैराँ हूँ ये सोच कर, क्यों फिर भी नहीं रूका ।

सुनते थे आईना कभी कहता नहीं है झूठ,
मुझको तो अपना ही अक्स इसमें नहीं दिखा ।

इन बेवफाओं को क्या कहूँ, या खुदा बता,
इतने बड़े ज़हाँ में इक तू जो है मिला ।

घबरा के आस छोड़ दी, ज़ाहिल ये क्या किया,
काँटों से डर के संग क्यों फूलों का तज़ दिया ।

किसका करूँ मैं शुक्रिया, किससे करूं गिला,
क्या पा लिया, क्या खो दिया, कुछ भी नहीं पता ।

दीवानों का क्या है?

इन बहारों का क्या है? फिज़ाओं का क्या है?
लूटने वाली तेरी अदाओं का क्या है?
हमें भूल कर आज बैठे सभी हैं,
बता दो, सिला इन वफाओं का क्या है?


जलती-बुझती शमाएँ, टिमटिमाते सितारे,
नज़ारों की तुम हो, नज़ारे तुम्हारे,
गुज़र कर रहे जो अंधेरों के दम पर,
सोचो कभी, उन बेचारों का क्या है?


बेगानों की खातिर, बने हो बेगाने,
हम तुम्हारे दीवाने, तुम किसी के दीवाने,
दीवानों की हालत में फिरते हो खुद भी,
और कहते हो हमको, दीवानों का क्या है?

भली सी बात!

घने पत्तों की छाँव से झाँकती,
सूरज की बिखरी-बिखरी रौशनी भी,
सुईयों की मानिंद काटने को दौड़ती हैं,
तेरी याद जब-जब दिल को झिंझोड़ती है ।


हरे-भरे पेड़-पौधे भी सूखे से लगते हैं,
हँसते-गाते लोग भी रूखे से लगते हैं,
जब तलक तेरा चेहरा दिखाई नहीं देता है,
भली सी बात भी दिल को कचोटती है ।


आँखें शीतल चाँदनी से भी जलने लगती हैं,
मधुर ब्यार भी आँधी सी लगती है,
सोती दुनिया मरूस्थल सी लगती है,
दिल की गलियों में जब तेरी याद दौड़ती है ।

Wednesday, September 12, 2007

गज़ल!

तुम्हे भुलाने की कोशिशें तो कीं,
दिल बार-बार लेकिन भटकता रहा ।

जिन राहों से गुज़र कर चले गये हो तुम,
वीरान आँखों से राहें वो तकता रहा ।

हवाएँ भी वही हैं, फिज़ाएँ भी वही,
मन तेरी खुशबुओं को लेकिन तरसता रहा ।

मार के ठोकर जहाँ से गुजरते थे,
चोट खा के मैं वहीं पर ही गिरता रहा ।

कभी तो आओगे मेरी खातिर यहाँ,
दिल यही ख्याल कर हरदम संभलता रहा ।

गज़ल!

तुम तो तुम ही रहे, हम ही न हम न रहे,
तुम चाहे न मिले, तुम्हारे ग़म तो मिले ।

सोचते हैं कहें क्या तुमको हम सनम,
तुम बावफा भी रहे और बेवफा भी बने ।

तड़प मेरे दिल में उठाई बोलो क्यों,
दिल दे कर मुकरते तो कम ही सनम मिले ।

वादा करके भुलाना हम को तो आता न था,
अब आ गया है ये भी, जब से हो तुम मिले ।

तुम तो थे बहाना, अपनी तो तकदीर है,
सब छोड़ गये भंवर में, जितने सनम मिले ।

गज़ल!

बड़ी भूल की, उन्हे अपना समझ लिया,
खिलते चमन से क्यों कांटों को चुन लिया ।

आये थे तेरे दर पे, दो पल दम तो लें,
तेरे ग़म को देख, दम मेरा निकल गया ।

सवाल पूछूँ मैं, क्यों सवाल करती हो,
तेरा सवाल ही तो ज़वाब बन गया ।

ठिठके ज़रा से हम थे, इस मोड़ पर कभी,
सारा सफर यहीं पर कैसे गुज़र गया ।

सरे-आम आशिकों को बदनाम कर दिया,
इक बेवफा का दामन मैंने पकड़ लिया ।

Tuesday, September 11, 2007

गज़ल!

इतनी बड़ी सज़ा दिल लगाने की,
छीन लिया चैन ज़िन्दगी भर का ।

ना यूँ दूर रखो अपने से मुझको,
टूट न जाये बाँध मेरे सब्र का ।

जीते जी मार दिया चाहत ने तेरी,
ना करो इन्तज़ाम अब मेरी कब्र का ।

सूनी निगाहें ले के कबसे खड़ें हैं,
कभी तो करो रुख तुम इधर का ।

दिल का इलाज़ करवाने चले थे,
रोग ले बैठ हैं सारी उम्र का ।

Monday, September 10, 2007

गज़ल

कौन चाहेगा उसे ज़माने में,
मौत भी चाहती नहीं जिसको ।

बिन बुलाये जो चले आते थे,
आवाज़ सुनती नहीं अब उनको ।

शोर करते थे जो वफाई का,
ज़फा शान लगती अब उनको ।

जिस शमा को बुझा दो, कहते थे,
खुद जला गये उससे वो हमको ।

गिला शिकवा ये दिल न कर बैठे,
भुला बैठै हैं अब ज़माने को ।

Friday, September 7, 2007

गज़ल

कोई तो चैन की दवा ला दो,
न हो तो मौत की सज़ा ला दो !

खो गये साथ-साथ चलते वो,
उनके कदमों के तुम निशां ला दो!

आँख उनकी हो, ख्वाव मेरे हों,
फिर से वो रात का समां ला दो!

अपने वादों से न मुकरता हो,
ऐसा इक दोस्त बावफा ला दो!

न जियें रोज़-रोज़ मर कर हम,
ऐसे इक शहर का पता ला दो!

Thursday, September 6, 2007

गज़ल

कोई तन्हा-तन्हा रहता है, कोई हरदम हँसता रहता है,
सब अपनी-अपनी किस्मत है, कि कैसा रस्ता मिलता है ।

वादों पे जियें तो कैसे जियें, झूठों से भरी इस दुनिया में,
कोई करता यूँ ही बात कभी, कोई अपना समझ के मरता है ।

सब जान के भी अनजान बनें, सब ऐसी बातें करते हैं,
जो दिल में हो, वही बात करे, वो शख्स कहाँ पर मिलता है ।

जो खुद ही रस्ते भूला हो, पहुँचे कैसे मँजिल पर वो,
शिकवा कैसा औ' कैसा गिला, वो यूँ ही भटकता रहता है ।

Wednesday, September 5, 2007

गीत

सब अपने-अपने साथी हैं, यहाँ कौन किसी पर मरता है,
होली जो जली अरमानों की, अपना ही यहाँ पर हँसता है ।

क्यों ठुकराया था ज़हाँ मैंने, तुझसे ठुकराये जाने को,
क्यों सबके दुश्मन हो बैठे, दुश्मन को अपना बनाने को,
अब देख ज़फा तेरी ही सनम, मुझ पर ये ज़माना हँसता है ।


साया ही हमारा हो न सका, क्या दोष है इन अँधियारों का,
जीना मुशिकल, मरना मुशिकल, कोई साथ न दे बचारों का,
चलते हैं अकेले हारे हुए, नहीं साथ में कोई चलता है ।

Monday, September 3, 2007

किधर भागे!

प्रीत के धागे
इस तरह से बाँधें
भागे तो कोई
किधर भागे!

आएँ सजनवा
सपनों में ही
नींद से फिर कोई
क्यों जागे!

दिल ही न समझे
दिल की बातें
उनकी बात
कैसे जानें!

हर राह तुम्ही पर
ख्तम है होती
और कहीं दिल
क्यों लागे!

Friday, August 31, 2007

समझ न पाया!

सौ-सौ मन हुए

एक मन के

मनके की माला सा गुँथ

बना गलहार!



मनोवेग

व्यस्त आँचल से

उड़े-उड़े जाते हैं

आ समेट इन्हे

मेरा जीवन सँवार!



निरथ्रक भटकता रहा

जीवन की

सुनसान गलियों में

कोई अर्थ दे दो इसे

लगाओ इक मीठी पुकार!



यूँ ही करता रहा

तुमसे शिकायत

समझ न पाया

कि छुईमुईपन तुम्हारा

है नारी-सुलभ श्रंगार!

Thursday, August 30, 2007

तुम ही नहीं थे!

बीत गये पल तन्हा- तन्हा,
साथ मेरे पर तुम ही नही थे!

सोते-उठते ख्वाब तो आते,
ख्वाबों में लेकिन तुम ही नहीं थे!

बातें बहुत थीं कहने को तुमसे,
सुनने को लेकिन तुम ही नहीं थे!

तुमको तुमसे माँग रहा हूँ,
देने को राज़ी तुम ही नहीं थे!

दीप बहुत थे, फिर भी अँधेरा,
करने को रौशन तुम ही नहीं थे!

Wednesday, August 29, 2007

गीत

पीता रहा मैं ग़म की शराब,
एक समन्दर हूँ मैं ग़म का ।

टूट गये कितने ही सपने,
रूठ गये जितने थे अपने,
लूट ली उसने ही आशाएँ,
जो था हमदम मेरे मन का,
एक समन्दर हूँ मैं गम का ।

पथ कँटीले, सूनी राहें,
पत्थर जग से कौन निबाहे,
जिसको जग में न कोई चाहे,
सीधी राह पे वो भी भटका,
एक समन्दर हूँ मैं ग़म का ।

Friday, August 24, 2007

गज़ल!

आसाँ सी कट रही थी ज़िंदगी,
क्यों तेरे रुबरु हो बैठा?

करवटें लेने की आदत तो न थी,
यूँ ही तुझे क्यों छू बैठा?

जाते ही नही मेरे ख्वाबों से वो,
मैं आँख बंद क्यों कर बैठा?

जाने कहाँ पहुँचा दे ये राहें,
कदम इन पर क्यों रख बैठा?

परेशानियाँ वैसे ही कुछ कम न थीं,
एक और गम क्यों ले बैठा?