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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Friday, June 22, 2007

किसको चाहूँ!

जब
किसी की
चाहत न मिली
न ही
किसी ने
मेरी चाहत को
स्वीकार किया
तो
मैंने
स्वयँ को ही
प्यार करना शुरू कर दिया
इससे भी
उन्हे तकलीफ हुई
उन्होने हमें
खुदगर्ज कहना शुरू कर दिया
भई
हद हो गई
न तो तुम हमें चाहो
न हम तुम्हे चाहें
और
न ही
हम स्वयँ को चाहें
तो कहो
हम किसको चाहें!

2 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

न तो तुम हमें चाहो
न हम तुम्हे चाहें
और
न ही
हम स्वयँ को चाहें
तो कहो
हम किसको चाहें!

--वाह, क्या बात कही!! :)

June 22, 2007 at 10:07 PM  
Blogger राजीव रंजन प्रसाद said...

तो
मैंने
स्वयँ को ही
प्यार करना शुरू कर दिया

डा. साहब बहुत सुन्दर रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

June 25, 2007 at 11:17 AM  

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