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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Sunday, April 6, 2008

गज़ल!

ग़म मिलते रहे मुझे बेइन्तिहा, मैं समझता रहा उन्हे इम्तिहां,
कोई वादा किसी ने किया तो न था, पाले रहे हम यूँ ही गुमां ।

तोड़ना चाहा तारे बढ़ा के ये हाथ, आसमाँ ऊँचा लेकिन होता गया,
दूर से दिखते हैं मिलते हुए, जमीं आसमाँ लेकिन हैं मिलते कहाँ ।

हमने देखा हैं रंगों को खिलते हुए, बूंदे बारिश की फैली फलक पे हों जब,
तिलिस्म सपने सारे आँखों के हैं, बाद बारिश के दिखते हैं रंग कहाँ ।

कोई तकदीर को कैसे साथी कहे, वो तो अपनी ही मर्जी से चलती चले,
कौन जाने दग़ा देगी किस मोड़ पर, उसके हाथों में खेला है सारा जहाँ ।

वक्त किसी के लिये तो ठहरता नहीं, मोड़ना कर्म से कभी मुहँ को नहीं,
तू जहाँ से, तुझसे जहाँ है बना, तू नहीं तो जहाँ भी कहाँ है रहा ।

2 Comments:

Anonymous Anonymous said...

कोई तकदीर को कैसे साथी कहे, वो तो अपनी ही मर्जी से चलती चले,
कौन जाने दग़ा देगी किस मोड़ पर, उसके हाथों में खेला है सारा जहाँ ।
ye bahut sahi baat hai,bahut sundar

April 7, 2008 at 3:14 PM  
Anonymous Anonymous said...

Hello. This post is likeable, and your blog is very interesting, congratulations :-). I will add in my blogroll =). If possible gives a last there on my blog, it is about the Impressora e Multifuncional, I hope you enjoy. The address is http://impressora-multifuncional.blogspot.com. A hug.

April 12, 2008 at 4:11 PM  

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