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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Monday, April 13, 2009

गज़ल !

रोयाँ-रोयाँ रोया था तेरी खातिर,
चैन दिल ने खोया था तेरी खातिर ।

बात तारों से कर के गुजारूँ मैं रात,
मैं न कब से सोया था तेरी खातिर ।

फकत काँटे ही मुझको थमाये थे क्यों,
फूल मैंने बोया था तेरी खातिर ।

तुम तो गैरों को करते रहे थे हवा,
होश मैंने खोया था तेरी खातिर ।

कोई सुनता नहीं क्यों मेरी दास्ताँ,
ये जहाँ भी गोया था तेरी खातिर ।

6 Comments:

Blogger रंजना said...

Waah !! Sundar Gazal !!

April 13, 2009 at 4:38 PM  
Blogger अनिल कान्त : said...

ग़ज़ल बहुत शानदार है ...मोहब्बत में ऐसा भी होता है

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

April 13, 2009 at 5:12 PM  
Anonymous mehek said...

तुम तो गैरों को करते रहे थे हवा,
होश मैंने खोया था तेरी खातिर ।

कोई सुनता नहीं क्यों मेरी दास्ताँ,
ये जहाँ भी गोया था तेरी खातिर
behad sunder

April 13, 2009 at 7:51 PM  
Blogger अविनाश वाचस्पति said...

शब्‍दों के हो मनभावों के हो
गोया तुम हो शातिर शातिर

April 13, 2009 at 11:00 PM  
Blogger neeshoo said...

महकती हुई गजल । सुन्दर लगी

April 14, 2009 at 12:44 AM  
Blogger P.K Gautam said...

very good bahut acha laga gajal ko padh kar Anil g kya Khoob Likhte ho

November 1, 2011 at 1:55 PM  

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