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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Saturday, October 20, 2007

ऐसा तो कभी हुआ न था!

ऐसा तो कभी हुआ न था कि रातों की नींद उड़ गई हो हमारी,
ज़रूर वो हमारी याद में करवटें बदलती होगी !

ऐसा तो कभी हुआ न था कि बहारें हमसे गुफत्गु न करें,
ज़रूर बहारें तेरी ज़ुल्फों के साये में मचलती होंगी!

ऐसा तो कभी हुआ न था कि बादल यूँही बेसाख्ता बरसने लगें,
ज़रूर घटाएँ तुझ बिन आँसू बहाती होंगी !

ऐसा तो कभी हुआ न था कि सूरज अपनी गर्मी भूल जाता हो,
ज़रूर तुम अपना चेहरा उसको दिखलाती होगी!

ऐसा तो कभी हुआ न था कि वक्त भी चलते-चलते थम जाये,
ज़रूर देखली उसने तेरी चाल मदमाती होगी!

2 Comments:

Blogger Sanjeeva Tiwari said...

बहुत अच्‍छी रचना, धन्‍यवाद

'आरंभ' छत्‍तीसगढ का स्‍पंदन

October 20, 2007 at 3:07 PM  
Blogger Udan Tashtari said...

बढ़िया है, अनिल जी.

October 20, 2007 at 6:17 PM  

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