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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Monday, September 17, 2007

तेरा शुक्रिया!

सुप्त थी भावना,
जगा दिया -
जादू किया !


ओढ़ के चादर मस्त अंधेरों की,
मग्न था, न थी खबर सवेरों की,
आस का इक दिया जला दिया -
खूब किया,
जादू किया !


बिना पतवार और मांझी के मैं,
उतरता-डूबता था थपेड़ों में मैं,
किनारे नैया को लगा दिया -
दे के जिया,
जादू किया !


मंजिलें थीं मगर हम भटकते थे,
सीधे से रास्ते भी न मिलते थे,
रास्ता इक नया दिखा दिया -
तेरा शुक्रिया,
जादू किया !

1 Comments:

Blogger neeshoo said...

सर शुक्रिया आपका बहुत ही अच्छी कविता लगी।

September 17, 2007 at 10:43 PM  

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