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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Sunday, February 24, 2008

गज़ल!

क्या ज़रूरत है बेवफाई का सबब जानने की,
जो प्यार न करें, उनसे प्यार माँगने की ।

दर्दे-दिल उनका दिया दिल में ही रहने दो,
उनकी मंशा नहीं है मेरा दर्द बाँटने की ।

दो लफ्ज़ भी ग़र कह देते अपनी ज़ुबाँ से वो,
वजह मिल जाती हमें हयात काटने की ।

दिल तो हमने ही दिया है बिन माँगे उनको,
फिर तकलीफ क्यों हो हमें दिल हारने की ।

बेशक न रखते वो मेरा दिल अपने पास,
पर तदबीर तो न करते वो हमें मारने की ।

3 Comments:

Anonymous विनय 'नज़र' said...

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल...

February 24, 2008 at 10:58 PM  
Anonymous mehek said...

bahut khub,sahi gum-e-dil.dil mein hi achha,kya jarurat zamane ko ruswai dikhane ki.

February 25, 2008 at 11:23 AM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

गज़ल पसंद आने के लिये बहुत-बहुत शुक्रिया विनय एवँ महक जी ।

February 25, 2008 at 12:07 PM  

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