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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Wednesday, September 12, 2007

गज़ल!

तुम तो तुम ही रहे, हम ही न हम न रहे,
तुम चाहे न मिले, तुम्हारे ग़म तो मिले ।

सोचते हैं कहें क्या तुमको हम सनम,
तुम बावफा भी रहे और बेवफा भी बने ।

तड़प मेरे दिल में उठाई बोलो क्यों,
दिल दे कर मुकरते तो कम ही सनम मिले ।

वादा करके भुलाना हम को तो आता न था,
अब आ गया है ये भी, जब से हो तुम मिले ।

तुम तो थे बहाना, अपनी तो तकदीर है,
सब छोड़ गये भंवर में, जितने सनम मिले ।

1 Comments:

Blogger परमजीत बाली said...

अनिल जी ,आप अच्छा लिखते हैं।आप की गजल पसंद आई।

तुम तो थे बहाना, अपनी तो तकदीर है,
सब छोड़ गये भंवर में, जितने सनम मिले ।

September 12, 2007 at 7:08 PM  

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