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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Wednesday, September 5, 2007

गीत

सब अपने-अपने साथी हैं, यहाँ कौन किसी पर मरता है,
होली जो जली अरमानों की, अपना ही यहाँ पर हँसता है ।

क्यों ठुकराया था ज़हाँ मैंने, तुझसे ठुकराये जाने को,
क्यों सबके दुश्मन हो बैठे, दुश्मन को अपना बनाने को,
अब देख ज़फा तेरी ही सनम, मुझ पर ये ज़माना हँसता है ।


साया ही हमारा हो न सका, क्या दोष है इन अँधियारों का,
जीना मुशिकल, मरना मुशिकल, कोई साथ न दे बचारों का,
चलते हैं अकेले हारे हुए, नहीं साथ में कोई चलता है ।

1 Comments:

Anonymous Anonymous said...

saya agar sath de ne laga,
to log julpho ke saye me rat bittane lage,
phir kaon saphira hoga jo ashiya talase ga
chhada ji

May 18, 2008 at 12:15 PM  

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