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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Monday, June 1, 2009

"दर्द का सिलसिला"

दर्द का सिलसिला है चल पड़ा
कौन जाने अब मिले कहाँ दवा

जान जिस को गिरवी हमने दे दी थी
बीच चौराहे पे सौदा कर गया

वो जुबाँ से कुछ कभी कहते नहीं
सोचते हैं हमको सब कुछ है पता

शौक से तू चुभा नश्तर मेरे
जख्म भी नासूर अब तो बन चुका

दरमियाँ बातों के सब कुछ कह दिया
पूछते हो फिर तुम्हारी क्या खता

5 Comments:

Blogger रंजना said...

Waah ! Waah ! Waah !

Bahut sundar bhavpoorn abhivyakti..Sundar gazal...

June 1, 2009 at 4:19 PM  
Blogger अनिल कान्त : said...

bahut achchhi lagi

June 1, 2009 at 4:42 PM  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

वाह...वा...बहुत खूब अनिल जी अच्छी ग़ज़ल कही है...हर शेर दिल से निकला हुआ है...लिखते रहिये...
नीरज

June 1, 2009 at 6:22 PM  
Blogger परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

June 1, 2009 at 7:04 PM  
Blogger Mrs. Asha Joglekar said...

अच्छी लगी बहुत ये गज़ल आपकी ।

June 6, 2009 at 12:20 AM  

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