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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Friday, May 29, 2009

"तुम आये, दीप जले !"

तुम आये, दीप जले
वन-उपवन फूल खिले

नीरव मन, जड़ चेतन
नहीं बीते कोई क्षण
आहट तेरी सुन
ह्रदय के तार हिले
तुम आये, दीप जले

विहग हुए अनमन
करें न कोई स्वन
सुन तेरी पायल की धुन
सुरीली गुंजन निकले
तुम आये, दीप जले

चक्षु रहें थे बंद मेरे
निरंतर लें स्वप्न तेरे
ख्यालों-ख्यालों में ही
नयनों के तीर चले
तुम आये, दीप जले

क्रूर दिवाकर देह जलाये,
मनोवेग हैं मन बहकाये,
रुत कोई नहीं मन भाये,
तुम आओ, मौसम बदले
तुम आये, दीप जले


1 Comments:

Blogger रंजना said...

Waah !!

Komal bhavbhari Bahut bahut bahut hi sundar geet...Aanand aa gaya padhkar..

May 29, 2009 at 5:57 PM  

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