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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Wednesday, March 4, 2009

भीनी-भीनी धूप !

लज़ीले चेहरे को यूँ छुपाया काली ज़ुल्फों ने,
सुबह की लालिमा को जैसे ढाँपे कोहरा ठंड में !

सिमटती जा रही हो शर्म से खुद ही में तुम ऐसे,
कली जैसे खिले आधी बला के सर्द मौसम में !

पता है, क्यों गुलाबी होंठ कुम्हलाए पड़े हैं यूँ,
है चूमा बार-बार इनको, हवा मस्ताई जालिम ने !

सूनापन ये आँखों का तुम्हारी खा रहा चुगली,
चुरा के ले गया है मन को कोई प्यारे आलम में !

उठा के भारी पलकों को, झटक के काली ज़ुल्फों को,
खिलाओ भीनी-भीनी धूप मेरे मन के आँगन में !


[ये कविता दिल्ली प्रेस की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।]

3 Comments:

Blogger नीरज गोस्वामी said...

सिमटती जा रही हो शर्म से खुद ही में तुम ऐसे,
कली जैसे खिले आधी बला के सर्द मौसम में !

सुभान अल्लाह अनिल भाई...क्या बात है...बहुत खूब...वाह..

नीरज

March 4, 2009 at 3:02 PM  
Blogger neeshoo said...

bahut badhiya sir ji...............

March 4, 2009 at 6:31 PM  
Blogger Udan Tashtari said...

उठा के भारी पलकों को, झटक के काली ज़ुल्फों को,
खिलाओ भीनी-भीनी धूप मेरे मन के आँगन में !


--बेहतरीन बहती हुई रचना!! वाह!!

March 4, 2009 at 7:54 PM  

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