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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Sunday, April 27, 2008

हमने देखा उसे भटकते हुए !

चाँद सोया नहीं है सदियों से,
जाने क्या ढ़ूँढ़ता है सदियों से ।

हमने देखा उसे भटकते हुए,
छत पे,आँगन में,सूनी गलियों में ।

रास तारे भी नहीं आयें इसे,
जाने क्या देखा इसकी अँखियों ने ।

रफ्ता-रफ्ता ये रोज़ घटता रहा,
इसको देखा है मरते कईयों ने ।

चांद का दर्द नहीं समझा कोई,
कही अपनी ही जग में कवियों ने ।

फिर भी देखो ये चाँद खिलता रहा,
दिल की कहता रहा शैदाईयों से ।

5 Comments:

Anonymous mehek said...

wah behad dilkash sundar,chand ka dard bahut kam log samjhte hai.

April 27, 2008 at 8:42 PM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

गज़ल पसन्द आने के लिये बहुत-बहुत शुक्रिया, महक जी !

April 28, 2008 at 6:47 AM  
Blogger राजीव रंजन प्रसाद said...

डॉ. अनिल,

कई शेर बेहतरीन हैं..

रफ्ता-रफ्ता ये रोज़ घटता रहा,
इसको देखा है मरते कईयों ने ।

बधाई स्वीकारें..

*** राजीव रंजन प्रसाद
www.rajeevnhpc.blogspot.com

April 28, 2008 at 10:32 AM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

गज़ल के शेर पसन्द आने का बहुत-बहुत शुक्रिया राजीव जी । ऐसे ही कोशिश करता रहुँगा ।

April 28, 2008 at 12:13 PM  
Blogger Mrs. Asha Joglekar said...

चांद का दर्द खूब बयाँ किया है, बधाई ।

May 4, 2008 at 2:17 AM  

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