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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Monday, March 17, 2008

इतना तो हक दिया होता !

तुम्हे जब चाहूँ याद कर लूँ,
इतना हक तो दिया होता ।
ख्यालों में तुमसे मुलाकात कर लूँ,
इतना हक तो दिया होता ।

वैसे तो कोई रिश्ता न था अपना,
तुमसे कोई वास्ता न था अपना,
कोई रिश्ता न सही, कोई वास्ता न सही,
बात करने का हक तो दिया होता ।

सवालों के धेर में पड़ गया दिल,
तेरे फेर में पड़ गया दिल,
कोई रास्ता न कदमों को सूझे अब,
अपने घर का पता तो दिया होता ।

चल पड़े हम यूँ डगमगाते से,
तेरे तीरे नज़र से तड़पड़ाते से,
कोई खाने को बैठा है खुशी से,
नज़रों का इक वार तो किया होता ।

6 Comments:

Anonymous क्रिशन लल said...

कोई रिश्ता न सही, कोई वास्ता न सही,
बात करने का हक तो दिया होता ।
सर जी
बात तो तब करते जब तुमने
अपना फोन नम्बर दिया होता

March 18, 2008 at 1:03 PM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

23742176

March 18, 2008 at 2:22 PM  
Blogger परमजीत बाली said...

अपनें मनोभावों को रचना में अच्छापिरोया है।सुन्दर!

March 18, 2008 at 5:31 PM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

धन्यवाद बालीजी

March 18, 2008 at 8:38 PM  
Anonymous mehek said...

bahut hi sundar,apratim rachana

March 18, 2008 at 9:17 PM  
Blogger ©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

बहुत-बहुत धन्यवाद महक जी। आपको मेरी रचनायें पसन्द आती हैं, इसलिये प्रतिक्रिया का इन्तजार रहता है ।

March 19, 2008 at 10:12 AM  

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