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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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प्रेम अनुभूतियाँ

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

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Friday, September 21, 2007

गज़ल!

बात किससे करें, हर शख्स है गमगीं यहाँ,
ओढ़े फिरते हँसी, चेहरों पर नकली यहाँ ।


दिल गुनहगार है, खुशियों का तकाज़ा करके,
किसको मालूम था, खुशियाँ भी हैं बिकती यहाँ ।


कैसे कह दें कहो, मयखाने को ग़म का साथी,
ग़मों का ये ज़ोर है, मय भी नहीं चढ़ती यहाँ ।


हम हैं नाचीज़, कब हों फनाँ क्या मालूम,
याद रह जायें गें, गज़लें नहीं मरती यहाँ ।

3 Comments:

Blogger मोहिन्दर कुमार said...

अनिल जी,

सभी शेर सुन्दर बन पडे हैं.. खासकर

दिल गुनहगार है, खुशियों का तकाज़ा करके,
किसको मालूम था, खुशियाँ भी हैं बिकती यहाँ ।

हम हैं नाचीज़, कब हों फनाँ क्या मालूम,
याद रह जायें गें, गज़लें नहीं मरती यहाँ ।

बधाई

September 21, 2007 at 1:56 PM  
Blogger Udan Tashtari said...

हम हैं नाचीज़, कब हों फनाँ क्या मालूम,
याद रह जायेंगें, गज़लें नहीं मरती यहाँ ।

--बहुत खूब!! वाह!! लिखते रहें.

September 21, 2007 at 8:44 PM  
Blogger deepanjali said...

आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

September 25, 2007 at 2:24 PM  

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